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२ औरतो ने किया ऐसा डरावना काम की सबके होश उड़ गए






संध्या का समय हो चुका था लगभग, सूर्य अपने अस्तांचल में प्रवेश करने की तैयारी करने ही वाले थे, पक्षी आदि अपने अपने घरौंदों की ओर उड़ रहे थे, कुछ एकांकी और कुछ गुटों में! लोग-बाग़ कुछ पैदल और अपनी अपनी साइकिल पर चले जा रहे थे आगे खाली खाने के डब्बे बांधे और कुछ भाजी-तरकारी लिए, सवारी गाड़ियों में जिसे यहाँ के निवासी आपे कहते हैं, भरे पड़े थे खचाखच! कुल मिलकर लग रहा था की दिवस का अवसान हो चुका है और और अब रात्रि के आगमन की बेला आरम्भ हो चुकी है! सड़क किनारे खड़े खोमचे अब प्रकाश से जगमगा उठे थे, सड़क किनारे एक सरकारी शराब के ठेके पर खड़े वाहन गवाही दे रहे थे कि मदिरा-समय हो चुका है! उधर ही आसपास कुछ ठेलियां भजी खड़ी थीं जिन पर ठेके से सम्बंधित वस्तुएं ही बेचीं जा रही थीं, गिलास, नमकीन, उबले चने इत्यादि! तभी हामरी गाड़ी चला रहे क़य्यूम भाई ने भी गाड़ी उधर ही पास में उसी ठेके के पास लगा दी, थोड़ी सी आगे-पीछे करने के बाद गाड़ी खड़ी करने की एक सही जगह मिल ही गयी, सो गाड़ी वहीँ लगा दी गयी, गाड़ी का इंजन बंद हुआ और हम दरवाजे खोल कर बाहर आये, ये गाड़ी जीप थी, क़य्यूम भाई ने नई ही खरीदी थी और शायद पहली बार ही वो शहर से इतनी दूर यहाँ आई थी!
हम बाहर उतरे तो अपनी अपनी कमर सीधी की, आसपास काफी रौनक थी, ये संभवतः किसी कस्बे का ही आरम्भ था, मदिरा-प्रेमी वहीँ भटक रहे थे, कुछ आनंद ले चुके थे और अब वापसी पर थे और कुछ अभी अभी आये थे जोशोखरोश के साथ!
"क्या चलेगा?" क़य्यूम भाई ने पूछा,
मै कुछ नहीं बोला तो क़य्यूम भाई की निगाह शर्मा जी की निगाह से टकराई, तो शर्मा जी ने मुझसे पूछा, "क्या लेंगे गुरु जी?"
"कुछ भी ले लीजिये" मैंने कहा,
"बियर ले आऊं?" क़य्यूम भाई ने पूछा,
"नहीं, बियर नहीं, आप मदिरा ही ले आइये" मैंने कहा,
क़य्यूम भाई मुड़े और चल दिए ठेके की तरफ!
"अन्दर बैठेंगे या फिर यहीं गाड़ी में?" शर्मा जी ने मुझ से पूछा,
"अन्दर तो भीड़-भाड़ होगी, यहीं गाड़ी में ही बैठ लेंगे" मैंने कहा,
थोड़ी देर बाद ही क़य्यूम भाई आये वहाँ, हाथ में मदिरा की दो बोतल लिए और साथ में ज़रूरी सामान भी, शर्मा जी ने गाड़ी का पिछला दरवाज़ा खोला और क़य्यूम भाई ने सारा सामान वहीँ रख दिया, फिर हमारी तरफ मुड़े,
"आ रहा है लड़का, मैंने मुर्गा कह दिया है, लाता ही होगा, आइये, आप शुरू कीजिये" क़य्यूम भाई ने कहा,
मै और शर्मा जी अन्दर बैठे, एक पन्नी में से कुछ कुटी हुई बरफ़ निकाली और शर्मा जी ने दो गिलास बना लिए, क़य्यूम भाई नहीं पीते थे, ये बात उन्होंने रास्ते में ही बता दी थी, वो बियर के शौक़ीन थे सो अपने लिए बियर ले आये थे, थोड़ी देर में ही दौर-ए-जाम शुरू हो गया, एक मंझोले कद का लड़का मुर्गा ले आया और एक बड़ी सी तश्तरी में डाल वहीँ रख दिया, आखिरी चीज़ भी पूरी हो गयी!
ये स्थान था ग्वालियर से गुना के बीच का एक, हमको ग्वालियर से लिया था क़य्यूम भाई ने, हम उन दिनों ललितपुर से आये थे ग्वालियर, ललितपुर में एक विवाह था, उसी कारण से आना हुआ था, और क़य्यूम भाई गुना के पास के ही रहने वाले थे, उनका अच्छा-ख़ासा कारोबार था, सेना आदि के मांस सप्लाई करने का काम है उनका, तीन भाई हैं, तीनों इसी काम में लगे हुए हैं, क़य्यूम भी पढ़े लिखे और रसूखदार हैं और बेहद सज्जन भी!
"और कुछ चाहिए तो बता दीजिये, अभी बहुत वक़्त है" क़य्यूम भाई ने कहा,
"अरे इतना ही बहुत है!" शर्मा जी ने कहा,
"इतने से क्या होगा, दिन से चले हैं, अब ट्रेन में क्या मिलता है खाने को! खा-पी लीजिये रज के!" क़य्यूम भाई ने कहा,
इतना कह, अपनी बियर का गिलास ख़तम कर फिर से चल दिए वहीँ उसी दूकान की तरफ!
बात तो सही थी, जहां हमको जाना था, वहाँ जाते जाते कम से कम हमको अभी ३ घंटे और लग सकते थे, अब वहाँ जाकर फिर किसी को खाने के लिए परेशान करना वो भी गाँव-देहात में, अच्छा नहीं था, सो निर्णय हो गया कि यहीं से खा के चलेंगे खाना!
गाड़ी के आसपास कुछ कुत्ते आ बैठे थे, कुछ बोटियाँ हमने उनको भी सौंप दीं, देनी पड़ीं, आखिर ये इलाका तो उन्ही का था! उनको उनका कर चुकाना तो बनता ही था! वे पूंछ हिला हिला कर अपना कर वसूल कर रहे थे! जब को बेजुबान आपका दिया हुआ खाना खाता है और उसको निगलता है तो बेहद सुकून मिलता है! और फिर ये कुत्ता तो प्रहरी है! मनुष्य समाज के बेहद करीब! खैर,
क़य्यूम भाई आये और साथ में फिर से पन्नी में बरफ़ ले आये, बरफ़ कुटवा के ही लाये थे, ताकि उसके डेले बन जाएँ और आराम से गिलास में समां सकें! अन्दर आ कर बैठे और जेब से सिगरेट का एक पैकेट निकाल कर दे दिया शर्मा जी को, शर्मा जी ने एक सिगरेट निकाली और सुलगा ली, फिर दो गिलासों में मदिरा परोस तैयार कर दिए! थोड़ी ही देर में वो लड़का आया और फिर से खाने का वो सामान वहीँ रख गया! हम आराम आराम से थकावट मिटाते रहे!
मित्रगण, हम यहाँ एक विशेष कारण से आये थे, क़य्यूम भाई के एक मित्र हैं, हरि, हरि साहब ने गुना में कुछ भूमि खरीदी थी, भूमि कुछ तो खेती-बाड़ी आदि के लिए और कुछ बाग़ आदि लगाने के लिए ली गयी थी, दो वर्ष का समय हो चुका था, भूमि तैयार कर ली गयी थी, परन्तु उस भूमि पर काम कर रहे कुछ मजदूरों ने वहां कुछ संदेहास्पद घटनाएं देखीं थीं जिनका कोई स्पष्टीकरण नहीं हुआ था, स्वयं अब हरि ने भी ऐसा कुछ देखा था, जिसकी वजह से उसका ज़िक्र उन्होंने क़य्यूम भाई से और क़य्यूम भाई ने मेरे जानकार से किया, सुनकर ही ये तो भान हो गया था कि वहाँ उस स्थान पर कुछ तो विचित्र है, कुछ विचित्र, जिसके विषय में जानने की उत्सुकता ने अब सर उठा लिया था, कुछ चिंतन-मनन करने के बाद मैंने यहाँ आने का निर्णय लिया और अब हम उस स्थान से महज़ थोड़ी ही दूरी पर थे!


हमको गुना में नाना खेड़ी जाना था, हरि की रिहाइश वहीँ थी, गुना शहर का भी अपना ही एक अलग इतिहास है, इसका इतिहास काफी समृद्ध और रोमांचक है, पुराने अवंति साम्राज्य का ही एक हिस्सा रहा है गुना, बाद में कई और सत्ताधारी हुए और बाद में जा कर गुना मध्य प्रदेश में शामिल हुआ!
"और कुछ ले आऊं गुरु जी?" क़य्यूम भाई के सवाल ने मेरी तन्द्रा भंग की!
"अरे नहीं! यही बहुत है!" मैंने कहा,
"रुकिए, अभी आया" क़य्यूम भाई उठे और चल दिए फिर से ठेके की तरफ,
यहाँ मैंने एक और बड़ा सा पैग बनाया और खींच गया, फिर शर्मा जी से सुलगती हुई सिगरेट ले ली, कश मारा और सिगरेट वापिस उनको पकड़ा दी, उन्होंने भी एक जम कर कश मारा! धुंए को आज़ाद कर दिया उस सिगरेट से!
"गुरु जी, हरि ने जो भी बताया है वो है तो वैसे हौलनाक ही!" वे बोले,
"हाँ, अब तक तो हौलनाक ही है!" मैंने कहा,
"क्या लगता है आपको वहाँ?" उन्होंने पूछा,
"जाकर देखते हैं!" मैंने कहा,
"हाँ! कारण अभी स्पष्ट नहीं है, कभी-कभार प्रेत भी ऐसी माया रच दिया करते हैं!" उन्होंने सुझाया!
"हाँ, ये बात सच है शर्मा जी!" मैंने कहा,
तभी क़य्यूम भाई आये, साथ में वही मंझोले कद का लड़का भी था, उसके हाथ में इस बार कुछ नया ही व्यंजन था, उसने वो हमको थमाया, हमने थामा और वहीँ उस तश्तरी में रख लिया! लड़का चला गया वहाँ से! क़य्यूम भी पानी और बरफ ले आये थे और!
"ज्यादा हो जाएगा ये सब क़य्यूम भाई!" शर्मा जी ने कहा,
"कैसे ज्यादा! आप लीजिये बस!" उन्होंने हंस के कहा!
हमने एक एक टुकड़ा उठाया और फिर शर्मा जी ने मदिरा परोसना आरम्भ किया!
अब क़य्यूम भाई आ बैठे अपनी सीट पर!
"क़य्यूम भाई?" मैंने कहा,
"जी गुरु जी, पूछिए?" उन्होंने ध्यान देते हुए कहा,
"आपने हरि जी के बार में कुछ बातें बतायीं" मैंने कहा,
क़य्यूम भाई अपनी बियर खोलने के लिए अपना अंगूठा चलाया और सफलता मिल गयी! झक्क की आवाज़ करते हुए बियर खुल गयी!
"हाँ, गुरु जी?" क़य्यूम भाई ने पूछा,
"हरि साहब ने ये ज़मीन २ साल पहले ली थी?" मैंने पूछा,
''हाँ गुरु जी" वे बोले,
"किस से?" मैंने पूछा,
"मैंने ही दिलवाई थी, दरअसल मेरे एक जानकार थे उन्ही से" उन्होंने बताया,
"अच्छा, तो उन्होंने क्यों बेचीं?" मैंने पूछा,
"ये तो पता नहीं, उन्होंने जिक्र किया था की वे अपनी ज़मीन बेचना चाहते हैं" वे बोले,
अब तक शर्मा जी ने एक गिलास और बना दिया था, सो मैंने आधा ख़तम किया और बात फिर से ज़ारी रखी,
"मेरा पूछने का आशय था कि क्या ऐसी घटनाएं उनके साथ भी हुई थीं?" मैंने पूछा,
"उन्होंने तो कभी नहीं बताया ऐसा कुछ?'' वे बोले,
"हम्म!" मैंने कहा और बाहर देखा, बाहर दम हिलाते हुए कुत्ते खड़े थे, अबकी बार दो और बढ़ गए थे, मैंने एक एक बोटी उनकी तरफ उछाल दी, बड़ी सहजता से अपनी बारी का इंतज़ार करते हुए सभी का मुंह चलने लगा!
एक बोतल ख़तम हो गयी थी, बड़े सम्मान के साथ मैंने वो बोतल पास में ही लगे एक पेड़ के नीचे फेंक दी!
दूसरी बोतल खोल ली गयी!
"क्या नाम है आपके जानकार का?" मैंने पूछा,
"जी अनिल" वे बोले,
"अच्छा, तो अनिल ने ही ये ज़मीन हरि को बेचीं!" मैंने कहा,
"हाँ जी" वे बोले,
"तो क्या अनिल जी से मिला जा सकता है अगर ज़रुरत पड़ी तो?" मैंने पूछा,
"हाँ हाँ! क्यों नहीं!" वे बोले,
अब तक एक गिलास और बना दिया शर्मा जी ने, एक ही बनाया था, शर्मा जी ने अब ना कर दी थी, उनका कोटा पूरा हो गया था! मै अभी डटा हुआ था! मुठभेड़ ज़ारी थी मेरी अभी मदिरा से! वो मुझे पस्त करना चाहती थी और मै उसको!
मैंने एक टुकड़ा उठाया, फाड़ा और चबाने लगा! साढ़े ८ का समय हो चला था तब तक! शर्मा जी उठे और गाड़ी से बाहर निकले, कमर सीधी की और एक सिगरेट और पजार ली! वो लघु-शंका से निवृत होने चले गए!
"क़य्यूम साहब" मैंने कहा,
"जी?" वे बोले,
"बस अब निकलते हैं यहाँ से" मैंने कहा,
"हाँ, निबट लीजिये, और कुछ चाहिए हो तो बताइये" वे बोले,
"नहीं, और नहीं, बस!" मैंने कहा,
फिर मैंने दो पैग और लिए, निबट गया मै और शर्मा जी भी आ बैठे और हम अब चल पड़े अपनी मंजिल की ओर! गाड़ी दौड़ पड़ी सरपट!


जिस समय हम वहाँ पहुंचे, रात के पौने दस का समय था, हरि साहब के भी फ़ोन आ गए थे, उनसे बात भी हो गयी थी, तो हम सीधे हरि साहब के पास ही गए, उनके घर पर ही, हरि साहब ने शालीनता से स्वागत किया हमारा, खूब बातचीत हुई और फिर रात्रि में निंद्रा हेतु हमने उनसे विदा ली, एक बड़े से कमरे में इंतजाम किया गया था हमारे सोने का! ये घर कोई पुरानी हवेली सा लगता था! खाना खा ही चुके थे, नशा सर पर हावी था ही, थकावट सो अलग, सो बिस्तर में गिरते ही निंद्रा के समक्ष आत्मसमर्पण कर दिया!
जैसे लेटे थे उसी मुद्रा में सो गए!
सुबह जब आँख खुली तो सुबह के आठ बज चुके थे! हाँ, नींद खुल कर आई थी सो थकावट जा चुकी थी! दो चार ज़बरदस्त अंगडाइयां लेकर बदन के हिस्से आपस में जोड़े और खड़े हो गए!
फिर नित्य-कर्मों से फारिग होने के पश्चात नहाने के लिए मै सबसे पहले गया, स्नान किया, ताजगी आ गयी! फिर शर्मा जी गए और कुछ देर में वो भी वापिस आ गए नहा कर!
"यहाँ मौसम बढ़िया है" वे बोले,
"हाँ, इन दिनों में अक्सर ऐसा ही होता है यहाँ मौसम, दिन चढ़े गर्मी होती है और दिन ढले ठण्ड!" मैंने कहा,
"हाँ, रात को भी मौसम बढ़िया था, सफ़र आराम से कट गया इसीलिए!" वे बोले,
तभी कमरे में हरि साहब ने प्रवेश किया, उनके साथ एक छोटी सी लड़की भी थी, ये उनकी पोती थी शायद, नमस्कार हुई और हम तीनों ही वहाँ बैठ गए, लड़की भी नमस्ते करके बाहर के लिए दौड़ पड़ी! हँसते हुए!
"पोती है मेरी!" वे बोले,
"अच्छा!" शर्मा जी ने कहा,
तभी चाय आ गयी, ये उनका नौकर था शायद जो चाय लाया था, उसने ट्रे हमारी तरफ बढ़ाई, उसमे कुछ मीठा, नमकीन आदि रखा था, मैंने थोडा नमकीन उठाया और हमने अपने अपने कप उठा लिए और चाय पीनी शुरू की, नौकर चला गया तभी,
"और कोई परेशानी तो नहीं हुई आपको?" हरि साहब ने पूछा,
"नहीं नहीं! क़य्यूम भाई के साथ आराम से आये हम यहाँ!" मैंने कहा,
"कुछ बताया क़य्यूम भाई ने आपको?" उन्होंने चुस्की लेते हुए पूछा,
"हाँ बताया था" मैंने कहा,
"गुरु जी, बात उस से भी आगे है, मैंने क़य्यूम भाई को पूरी बात नहीं बतायी, मैंने सोचा की जब आप यहाँ आयेंगे तो आपको स्वयं ही बताऊंगा" वे बोले,
"बताइये?" मैंने उत्सुकता से पूछा,
"गुरु जी, जिस दिन से मैंने वो ज़मीन खरीदी है, उसी दिन से आप लगा लीजिये कि दिन खराब हो चले हैं" वे अपना कप ट्रे में रखते हुए बोले,
"कैसे?" मैंने पूछा,
"जी मेरे तीन लड़के हैं और एक लड़की, दो लड़के ब्याह दिए हैं और लड़की भी, अब केवल सबसे छोटा लड़का ही रहता है, नाम है उसका नकुल, पढाई ख़त्म कर चुका है और अब वकालत की प्रैक्टिस कर रहा है ग्वालियर में, दोनों बेटे भी अपने अपने काम में मशगूल हैं, एक मुंबई रहता है अपने परिवार के साथ, दूसरा आगरे में है अपने परिवार के साथ, उसकी भी नौकरी है वहाँ, अध्यापक है, आजकल यहीं आया हुआ है अपने परिवार के साथ, लड़की जो मैंने ब्याही है वो अहमदाबाद में है, २ वर्ष हुए हैं ब्याह हुए" वे बोले,
"अच्छा" मैंने कहा,
उन्होंने अपना चश्मा उतारा और रुमाल से साफ़ करते हुए बोले, " लड़की ससुराल में खुश नहीं है, बड़े लड़के का बड़ा लड़का, मेरा पोता बीमार हो कर ३ वर्ष का गुजर गया, अब कोई संतान नहीं है उसके, जो लड़का यहाँ आया हुआ है.." वे बोले,
मैंने तभी बात काटी और पूछा, "नाम क्या है जो आया हुआ है?"
"दिलीप" वे बोले,
"अच्छा" मैंने कहा,
"मै कह रहा था कि जो लड़का यहाँ आया हुआ है, उसके २ लडकियां ही हैं, लड़का कोई नहीं, उसकी पत्नी के गर्भ में कोई बीमारी बताई है डॉक्टर्स ने और अब संतान के लिए एक तरह से मना ही कर दिया है" वे बोले,
"अच्छा" मैंने कहा,
"एक बात और, मेरा अपना व्यवसाय है यहाँ, व्यवसाय लोहे का है, वो भी एक तरह से बंद ही पड़ा है दो साल से, कोई उछाल नहीं है" वे बोले,
"अच्छा" मैंने कहा,
"अब वही बात मै कह रहा था, कि जब से मैंने यहाँ वो ज़मीन ली है तबसे सबकुछ जैसे गड्ढे में चला गया है" वे बोले,
"अच्छा, और उस से पहले?" मैंने पूछा,
"सब ठीक ठाक था! कभी मायूसी नहीं थी घर-परिवार में!" वे बोले,
 


"अच्छा" मैंने कहा,
"हाँ जी, इस ज़मीन में ऐसा कुछ न कुछ ज़रूर है जिसकी वजह से ऐसा हुआ है हमारे साथ" वे बोले,
"क़य्यूम भाई ने बताया था कि वहाँ कुछ गड़बड़ तो है, अनेक मजदूरों ने भी देखा है वहाँ ऐसा कुछ, मुझे बताएं कि क्या देखा है ऐसा?" मैंने पूछा,
"हाँ जी, देखा है, वहाँ ४ मजदूर अपने परिवारों के साथ रहते हैं, उन्होंने वहाँ देखा है और महसूस भी किया है" वे बोले,
"क्या देखा है उन्होंने?'' मैंने पूछा और मेरी भी उत्सुकता बढ़ी अब!
"वहां एक मजदूर है, शंकर, उसने बताया था मुझे एक बार कि उसने और उसकी पत्नी ने खेत में दो औरतों को देखा है घूमते हुए, हालांकि उन औरतों ने कभी कुछ कहा नहीं उनको" वे बोले,
"दो औरतें?'' मैंने पूछा,
"हाँ जी" वे बोले,
"और कुछ?" मैंने पूछा,
"जहां पानी लगाया जाता है, उसके दो घंटे के बाद वो जगह सूख जाती है अपने आप! जैसे वहाँ कभी पानी लगाया ही नहीं गया हो!" वे बोले,
बड़ी अजीब सी बात बताई थी उन्होंने!
"ये एक ख़ास स्थान पर है या हर जगह?" मैंने पूछा,
"खेतों में ऐसे कई स्थान हैं गुरु जी, जहां ऐसा हो रहा है" वे बोले,
सचमुच में बात हैरत की थी!
"और कुछ?" मैंने पूछा,
"गुरु जी, शुरू शुरू में हमने एक पनिया-ओझा बुलवाया था, उसने पानी का पता तो बता दिया लेकिन ये भी कहा कि यहाँ बहुत कुछ गड़बड़ है और ये ज़मीन फलेगी नहीं हमको, उसका कहना सच हुआ, ऐसा ही हुआ है अभी तक, वहाँ से घाटे के आलावा कुछ नहीं मिला आज तक!" वे बोले,
"तो आपने किसी को बुलवाया नहीं?" मैंने पूछा, मेरे पूछने का मंतव्य वे समझ गए,
"बुलाया था, तीन लोग बुलाये थे, दो ने कहा कि उनके बस की बात नहीं है, हाँ एक ने यहाँ पर पोरे ग्यारह दिन पूजा की थी, लेकिन उसके बाद भी जस का तस! कोई फर्क नहीं पड़ा!" वे बोले,
स्थिति बड़ी ही गंभीर थी!
"आपने अनिल जी से इस बाबत पूछा?" मैंने सवाल किया,
"हाँ, उन्होंने कहा कि ऐसा तो उनके यहाँ न जाने कब से हो रहा है, किसी को चोट नहीं पहुंची तो कभी ध्यान नहीं दिया" वे बोले,
"मतलब उन्होंने अपने घाटे से बचने के लिए और आपने कच्चे लालच में आ कर ये ज़मीन खरीद ली!" मैंने कहा,
"हाँ जी, इसमें कोई शक नहीं, कच्चा लालच ही था मुझमे!" वे हलके से हँसते हुए ये वाक्य कह गए!
"कोई बात नहीं, मई भी एक बार देख लूँ कि आखिर क्या चल रहा है वहाँ?" मैंने कहा,
"इसीलिए मैंने आपको यहाँ बुलवाया है गुरु जी, ललितपुर वाले हरेन्द्र जी से भी मैंने इसी पर बात की थी" वे बोले,
"अच्छा, हाँ, मुझे बताया था उन्होंने" मैंने कहा,
तभी क़य्यूम भाई अन्दर आये, नमस्कार आदि हुई और वो बैठ गए,
"कुछ पता चला गुरु जी?" क़य्यूम भाई ने पूछा,
"अभी तो मैंने वहाँ की कुछ बातें सुनी हैं, आज चलेंगे वहाँ और मै स्वयं देखूंगा कि वहाँ आखिर में चल क्या रहा है?" मैंने कहा,
"ये सही रहेगा गुरु जी!" क़य्यूम भाई ने कहा,
"वैसे क्या हो सकता है? कोई कह रहा था कि यहाँ कोई शाप वगैरह है!" वे बोले,
"शाप! देखते हैं!" मैंने कहा,
"आप खाना आदि खा लीजिये, फिर चलते हैं वहाँ" हरि साहब ने कहा,
"हाँ, ठीक है" मैंने कहा,
"और क़य्यूम भाई आपका घर कहाँ है यहाँ?" शर्मा जी ने पूछा,
"इनके साथ वाला ही है शर्मा जी! आइये गरीबखाने पर!" वे बोले,
"ज़रूर, आज शाम को आते हैं आपके पास!" वे बोले,
"ज़रूर!" क़य्यूम भाई ने मुस्कुरा के कहा!
तभी हरि साहब उठे और बाहर चले गए!
"मौसम बढ़िया है यहाँ क़य्यूम भाई!" शर्मा जी ने कहा,
"खुला इलाका है, पथरीला भी है सुबह शाम ठंडक बनी रहती है, हाँ दिन में पारा चढ़ने लगता है!" वे बोले,
"और सुनाइये क़य्यूम भाई, घर में और कौन कौन है?" शर्मा जी ने पूछा,
"दो लड़के हैं जी, और माता-पिता जी" वे बोले,
"अच्छा! और दूसरे भाई?" उन्होंने पूछा,
"जी एक ग्वालियर में है और एक टेकनपुर में" वे बोले,
'अच्छा!" वे बोले,
"और काम-धाम बढ़िया है?" उन्होंने पूछा,
"हाँ जी, ठीक है, निकल जाती है दाल-रोटी!" हंस के बोले क़य्यूम भाई!
थोड़ी देर शान्ति छाई, इतने में ही हरि साहब अन्दर आ गए, बैठ गए!
"नाश्ता तैयार है, लगवा दूँ?" उन्होंने पूछा,
"हाँ, लगवा लीजिये" मैंने कहा,
वे उठ कर बाहर गए और थोड़ी देर बाद उनका नौकर नाश्ता लेकर आ गया, हम नाश्ता करने लगे!
"नाश्ते के बाद चलते हैं खेतों पर" मैंने कहा,
"जी, चलते हैं" हरि साहब बोले,
"मै आता हूँ फिर, गाड़ी ले आऊं" क़य्यूम भाई ने कहा,
"ठीक है, आ जाओ" हरि साहब बोले,
हम नाश्ता करते रहे, लज़ीज़ था नाश्ते का स्वाद! नाश्ता ख़तम किया और इतने में ही क़य्यूम भाई भी आ गए गाड़ी लेकर, तब हम चारों वहाँ से निकल पड़े खेतों की तरफ!
 



हम चारों खेत पहुंचे! बहुत ही खूबसूरत नज़ारा था वहाँ का! जंगली पीले रंग के फूलों ने ज़मीन पर कब्ज़ा जमा लिया था, उनमे से कहीं कहीं नीले रंग के फूल भी झाँक रहे थे, जैसे प्रकृति ने मीनाकारी का काम किया हो! कुछ सफ़ेद फूल भी निकले थे वहाँ, वो अलग ही खूबसूरती ज़ाहिर कर रहे थे! पेड-पौधों ने माहौल को और खुशगवार बना दिया था! अमरुद, बेर और आंवले के पेड़ों के समरूप रूप ने जैसे प्रकृति का सलोनापन ओढ़ लिया था! बेलों ने क्या खूब यौवन धारण किया था, काबिल-ए-तारीफ़! उनके चटख हरे रंग ने मन मोह लिया था, पीले रंग के फूल जैसे स्वर्ग का सा रूप देने में लगे थे! सच में प्राकृतिक सौंदर्य वहाँ उमड़ के पड़ा था! शुष्क नाम की कोई जगह वहाँ नहीं दिखाई दे रही थी! हर तरफ हरियाली और हरियाली!
"आइये, इस तरफ" हरि साहब ने कहा और जैसे मै किसी सम्मोहन से जागा!
जी, चलिए" मैंने कहा,
ये एक संकरा सा रास्ता था! दोनों तरफ नागफनी ने विकराल रूप धारण कर रखा था, लेकिन उसके खिलते हुए लाल और पीले फूलों ने उसकी कर्कशता को भी हर लिया था! बहुत सुन्दर फूल थे, बड़े बड़े! अमरबेल आदि ने पेड़ों पर अपनी सत्ता कायम कर रखी थी! मकड़ियों ने भी अपने स्वर्ग को क्या खूब सजाया था अपने जालों से! ऊंचाई पर लगे बड़े बड़े जाले!
"यहाँ से आइये" हरि साहब ने कहा, और हम उनके पीछे पीछे हो लिए, हम अब एक बाग़ जैसी ज़मीन में प्रवेश कर गए, खेतों में लगे बैंगन और गोभी आदि बड़े लुभावने लग रहे थे!
तभी सामने तीन पक्के कमरे बने दिखाई दिए, उसके पीछे भी शायद कमरे बने थे, वहाँ मजदूरों की भैंस और बकरियां बंधी थीं, चारपाई भी पड़ी थीं, उनके बालक वहीँ खेल रहे थे, हमे देख ठिठक गए!
कय्यूम भाई ने एक चारपाई बिछायी और एक पेड़ के नीचे बिछा दी, हम बैठ गए उस पर, अपने लिए उन्होंने एक और चारपाई बिछा ली, वे भी बैठ गए, तभी हरि साहब ने आवाज़ दी और अपने मजदूर शंकर को बुलाया, पहले उसकी पत्नी बाहर आई और फिर वो समझ कर चली गयी शंकर को बुलाने, शंकर कहीं खेत में काम कर रहा था उस समय,
"ये है जी ज़मीन" हरि साहब बोले,
"देख ली है, अभी जांच करूँगा यहाँ की" मैंने कहा,
कय्यूम भाई उठे और अन्दर से घड़े में से पानी ले आये, मैंने पानी के दो गिलास पिए और शर्मा जी ने एक, पानी भी बढ़िया और ठंडा था! उसी पनिया-ओझा के बताये हुए स्थान पर खोदे हुए कुँए का ही था!
तभी शंकर आ पहुंचा वहाँ, उसने नमस्ते की और अपने अंगोछे से अपना मुंह पोंछते हुए अपने हाथ धोये और फिर वहीँ एक खटोला बिछा कर बैठ गया!
हरि साहब ने दो चार बातें कीं उस से और फिर सीधे ही बिना वक़्त गँवाए काम की बात पर आ गए! अब शंकर मेरे सवालों का उत्तर देने को तैयार था!
"शंकर, जैसा मुझे हरि साहब ने बताया है वैसा कुछ देखा है आपने?" मैंने पूछा,
'हाँ जी, देखा है, मै क्या सभी ने देखा है यहाँ" वो बोला,
"अच्छा" मैंने कहा,
अब तक शंकर की पत्नी भी वहाँ आ बैठी, घूंघट किये हुए,
"क्या देखा है शंकर आपने?" मैंने पूछा,
"यहाँ अक्सर दो औरतें दिखाई देती हैं घूमते हुए" वो बोला,
"तुमने देखी हैं?" मैंने पूछा,
"हाँ जी, तीन बार" वो बोला,
"क्या उम्र होगी उनकी?" मैंने पूछा,
"जी पक्का पता नहीं, होगी ३०-३५ बरस" वो बोला,
"क्या पहन रखा है उन्होंने?" मैंने पूछा,
"कुछ नहीं" वो बोला,
"कुछ नहीं? मतलब नग्न?" मैंने पूछा,
"हाँ जी" वो बोला,
धमाका हुआ! मेरे दिमाग में हुआ धमाका! प्रेत यदि नग्न हो तो बलि कारण होता है उसका! और यहाँ बलि?
"पास में से देखी थीं?" मैंने पूछा,
"नहीं जी, कोई पचास फीट की दूरी से देखा था" वो बोला,
"किस जगह?" मैंने पूछा,
"जी पीछे है वो जगह, वहाँ केले, पपीते के पेड़ हैं" वो बोला,
"अक्सर वहीँ दिखाई देती हैं?'' मैंने पूछा,
"जी दो बार वहीँ दिखाई दी थीं, और एक बार कुँए के पास, चक्कर लगा रही थीं कुँए के" वो बोला,
"अच्छा, बाल कैसे हैं उनके?" मैंने पूछा,
"काले" उसने कहा,
"नहीं, खुले हैं या बंधे हुए?" मैंने पूछा,
"खुले हुए, छाती तक" वो बोला,
खुले हुए! फिर से बलि का द्योतक!
"किसी को पुकारती हैं? कुछ कहती हैं?" मैंने पूछा
"नहीं जी, चुप ही रहती हैं" वो बोला,
"अच्छा!" मैंने कहा,
"और गुरु जी, मेरी पत्नी ने भी कुछ देखा है यहाँ" वो बोला,
"क्या?" मैंने उत्सुकता से पूछा,
अब उसकी पत्नी की तरफ हमारी नज़रें गढ़ गयीं,
"क्या देखा आपने?" मैंने पूछा,
"जी मैंने यहाँ एक आदमी को देखा था, पेड़ के नीचे बैठे हुए" उसने बताया,
"आदमी? कैसा था वो?" मैंने कुरेदा!
"होगा कोई पचास-साठ बरस का, सर पर साफ़ सा बाँधा था उसने" वो बोली,
"और?" मैंने पूछा,
"वो बैठा हुआ था, जैसे किसी का इंतज़ार कर रहा हो, बीच बीच में उठकर सामने कमर झुक कर देखता था, फिर बैठ जाता था" उसने बताया,
"फिर?" मैंने पूछा,
"मैंने सोचा यहीं आसपास का होगा, मै वहाँ तक गयी और जैसे ही मेरी नज़र उस से मिली वो गायब हो गया, मै डर के मारे चाखते हुए वापिस आ गयी यहाँ और सभी को बताया!" वो बोली,
"अच्छा! ये कब की बात होगी?" मैंने पूछा,
"करीब छह महीने हो गए" वो बोली,
"फिर कभी नज़र आया वो?" मैंने पूछा,
"नहीं, कभी नहीं" उसने कहा,
"हम्म" मैंने मुंह बंद रखते हुए ही कहा,
तभी वो उठी और चली गयी वहाँ से!
 



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Morbi aliquam fringilla nisl. Pellentesque eleifend condimentum tellus, vel vulputate tortor malesuada sit amet. Aliquam vel vestibulum metus. Aenean ut mi aucto.

Kisi ke sharir me koi aur- Horror






मई २०१२ का समय था, मेरे पास एक सज्जन आये थे, नाम था अशोक, आये थे जिला रोहतक से, सरकारी मुलाज़िम थे, सीधे सादे और स्पष्ट व्यक्तित्व उनका! साथ में उनकी पत्नी श्रीमती ममता भी थीं, वे भी सरल स्वभाव की महिला थीं, उन्होंने जो समस्या बताई थी उस से मुझे भी झटका लगा था, डॉक्टर्स, अस्पताल सभी चल रहे थे, कई कई परीक्षण भी हुए लेकिन नतीजा सबका वही सिफर का सिफर!
समस्या उनकी बड़ी बेटी नेहा में थी, उसको एक आँख से दीखना बंद हो गया था, एक हाथ ने काम करना बंद कर दिया था, बोला जाता नहीं था और खड़े होते ही पाँव सुन्न हो जाता था उसका डायन, डॉक्टर्स की पकड़ में बात या मसला या मर्ज़ हाथ नहीं आ रहा था, पहले पहल तो मुझे भी ये चिकित्सीय समस्या लगी थी, तब मैंने उसका फ़ोटो मंगवाया था, आज ये फ़ोटो लेकर आये थे, जब मैंने फ़ोटो देखा और देख दौड़ाई तो समय उसी में अर्थात नेहा में ही लगी! अब समस्या क्या थी, ये वहीँ जाकर पता चल सकता था, अतः नेहा को देखने के लिए मैंने आगामी शनिवार जो कि दो दिन बाद था, का समय दे दिया, मैं रोहतक पहुंचूंगा करीब दिन में ग्यारह बजे शर्मा जी के साथ, इसके बाद वे दंपत्ति चले गए थे!
अब शर्मा जी ने पूछा!
"ऐसा क्या हो सकता है?"
"हो तो बहुत कुछ सकता है" मैंने कहा,
"मसलन?" उन्होंने जिज्ञासावश पूछा,
"कोई लपेट, कोई आसक्ति या कोई प्रयोग" मैंने बताया,
"अच्छा!" वे बोले,
"अब रोहतक जाना है?" उन्होंने पूछा,
"हाँ" मैंने कहा,
शाम हुई!
महफ़िल सजी!
तभी अशोक जी का फ़ोन आया, शर्मा जी ने सुना, पता चला कि छोटी बेटी को भी ऐसे ही लक्षण दिखायी दे रहे हैं और डॉक्टर्स इसको कोई आनुवांशिक रोग केह रहे हैं, मुझे हैरत हुई!
उनको दिलासा दी और फ़ोन काट दिया!
हमने अब अपनी महफ़िल में चार चाँद लगाए मदिरा से!
खा-पी कर सो गए!
फिर आया इतवार!
हम निकल पड़े तभी करीब नौ बजे, मेरे जाने से पहले मुझे किसी के रोने की आवाज़ आयी, मैंने आसपास देख कोई नहीं था, बड़ी अजीब सी बात थी!
खैर, हम चल पड़े!
ग्यारह बजे हम रोहतक पहुंचे, अशोक जी को खबर कर दी गयी थी, वे हमे घर में ही मिले, हम अब घर में गए! घर में मुर्दानगी छायी थीं, एक मनहूसियत!
"नेहा कहाँ है?" मैंने पूछा,
"ऊपर के कमरे में है" वे बोले,
"मुझे दिखाइये?" मैंने कहा,
"चलिए" वे बोले,
हम चले,
मैं अंदर घुसा तो बदबू का भड़ाका आया! मुर्दे की सड़ांध की बदबू! असहनीय बदबू! मैंने रुमाल से नाक भींच ली,
सो रही थी नेहा, एक दरम्याने कद के लड़की!
"नेहा?" उसके पिता जी ने आवाज़ दी,
वो नहीं उठी!
और तभी मैंने एक बात पर गौर किया!
एक दीवार पर करीब छह छिपकलियां इकट्ठी हो गयीं थीं, सर उठाये सभी मुझे ही घूर रही थीं!
मैं एक कुर्सी पर बैठ गया!
कई आवाज़ें दीं तो उठी नेहा!
और...


आँखें मींडते हुए उठ गयी नेहा, उसने हमे देख नमस्कार की और एक अनजान सी निगाह से हमको देखा, उम्र रही होगी करीब इक्कीस या बाइस बरस, उस से अधिक नहीं, मैंने उसको पूरा देखा, ऊपर से नीचे तक, कोई निशान या कोई लपेट नहीं थी उसमे, ये चौंकाने वाली बात थी!
"अशोक जी, एक गिलास पानी लाइए" मैंने कहा,
वो पानी लेने गए,
"क्या नाम है तुम्हारा?" मैंने नेहा से पूछा,
जानबूझकर!
"ने...ने...नेहा" उसने उबासी लेते हुए बताया,
"क्या समस्या है तुम्हारे साथ?" मैंने पूछा,
"कुछ भी नहीं? क्यों?" उसने मुझसे ही प्रश्न कर दिया,
अब तक पानी आ गया था, बात आधी ही रह गयी,
मैंने पानी को अभिमंत्रित किया और नेहा से कहा, "ये पानी पियो"
"उसने पानी का गिलास लिया!
उसको देखा,
सूंघा!
और नीचे बिखेर दिया!
बड़ी अजीब सी बात थी!
"नेहा?" चिल्लाये अशोक!
"ये क्या तंतर-मंतर है?" उसने पिता पर ध्यान नहीं दिया और मुझसे ही पूछा,
"किसने कहा ये तंतर-मंतर है?" मैंने उस से पूछा,
उसने मुंह फेर लिया!
"पापा, इनसे कहो ये जाएँ यहाँ से इसी वक़्त" उसने धमका के कहा!
अब मैं कुछ समझा!
"नेहा?" मैंने कहा,
"क्या है?" उसने झुंझला के पूछा,
"क्या नाम बताया तुमने अपना?" मैंने पूछा,
"क्यों? सुना नहीं?" उसने आँखें निकाल कर कहा!
"नहीं, भूल गया!" मैंने तपाक से उत्तर दिया!
"नेहा!" उसने कहा,
"नेहा तो इस लड़की का नाम है जिसकी देह है, तेरा नाम क्या है?" मैंने पूछा,
इस सवाल से अशोक जी को करंट सा लग गया! और नेहा संयत हो गयी!
"क्यों तुम्हे मैं कौन लगती हूँ?" उसने प्रश्न किया,
"मुझे तुम नेहा नहीं लगती" मैंने कहा,
"फिर?" उसने पूछा,
"ये तो तुम ही बताओ?" मैंने कहा,
अशोक जी घबराये!
मैंने उनको उनका हाथ पकड़ के नीचे बिठा लिया सोफे पर!
"हाँ? बता?" मैंने पूछा,
"जा,जा अब जा यहाँ से" उसने बेढंग से कहा,
"और न जाऊं तो?" मैंने कहा,
"तेरे बसकी बात नहीं, सुना?" उसने कहा,
अब तय हो गया कि नेहा, नेहा नहीं!
"तू बताती है या बकवाऊं तुझसे?" मैंने खड़े होकर पूछा,
'अच्छा! हाथ तो लगा कर देख, उखाड़ के फेंक दूँगी!" उसने कहा,
इतना सुन्ना था और मैंने खींच के एक झापड़ रसीद कर दिया उसको, वो पीछे गिर पड़ी!
खूंखार कुत्ते के भंति मुझपर झपटी तो मैंने एक और हाथ दिया उसको! वो फिर से नीचे गिरी, वो फि उठी तो अबकी बार शर्मा जी और अशोक ने पकड़ लिया उसे! वो अशोक के गर्दन पर काटने के लिए मशक्क़त करने लगी!
मुझे समय मिला और मैंने हामिर-अमल पढ़ दिया! और उसके चेहरे पर पानी फेंक मारा! झटके खाकर वो ढीली होती चली गयी और उन दोनों की बाजुओं में झूल गयी!
"लिटा दो इसको" मैंने कहा,
उन्होंने लिटा दिया!
वो लेट गयी, आँखें बंद करके!
और मैं वहीँ सोफे पर बैठ गया!

 


ये लपेट लगती थी, परन्तु ये पता लगाना था कि ये लपेट कहीं से लगी है या फिर किसी ने लगायी है, और नेहा हर हालत में ये कभी नहीं बताने वाली थी, इसीलिए मैंने अशोक जी से ही सवाल किये, "किसी से कोई पारिवारिक शत्रुता तो नहीं?"
"नहीं गुरु जी" वे बोले,
पहली शंका समाप्त!
"अच्छा, नेहा का किसी से कोई प्रेम-प्रसंग तो नहीं?" मैंने पूछा,
"नहीं गुरु जी" वे बोले,
दूसरी शंका भी समाप्त!
"आपने फ़ोन पर बताया था कि छोटी लड़की के ऊपर भी ऐसे ही असरात हैं, वो कहाँ है?" मैंने पूछा,
"अब वो ठीक है, आज अपनी बुआ के घर गयी है" वे बोले,
"अच्छा, एक बात और नेहा कहीं जल्दी में बाहर गयी थी?" मैंने पूछा,
"नहीं गुरु जी" वे बोले,
तीसरी शंका ने भी दम तोड़ा!
अब तक नेहा की माता जी भी आ चुकी थीं वहाँ, वो दरअसल चाय के लिए आयी थीं, बताने, नेहा को सोते देखा तो घबरा गयीं, शर्मा जी ने समझा बुझा दिया, फिर भी वे वहीँ बैठ गयीं,
अब मैंने ममता जी से प्रश्न किया, "क्या कोई ऐसी बात तो नेहा ने आपको बताई हो?"
"नहीं जी" उन्होंने उत्तर दिया,
अर्थात मेरे लिए और मुश्किलें बढ़ीं!
"आपकी छोटी बेटी का क्या नाम है?'' मैंने पूछा,
"सोनिया" वे बोलीं,
"क्या उसने कुछ बताया हो?'' मैंने पूछा,
"नहीं जी" वे बोलीं,
यहाँ भी रास्ता बंद!
तभी नेहा के बदन में झटके से लगे! वो झूलती हुई सी खड़ी हो गयी, बैठ गयी, डरावने तरीके में, गर्दन नीचे किये हुए और दोनों हाथ आगे करके!
ये निश्चित रूप से भयानक लपेट थी!
उसको ऐसा करते देख अशोक और ममता जी चिल्लाने लगे, हाल ऐसा कि जैसे बकरे को कसाई का चापड़ दिखायी दे जाए! बड़ी मुश्किल से उनको शांत किया, रोते-चिल्लाते ममता जी कमरे से बाहर भाग गयीं!
अब मैं खड़ा हुआ!
उसके पास तक गया, वो उसी रूप में गर्दन नीचे किये मेरी तरफ घूम गयी!
"कौन है तू?" मैंने पूछा,
कोई जवाब नहीं!
"बता? क्यों इस लड़की के पीछे पड़ी है?" मैंने पूछा,
पुनः कोई उत्तर नहीं!
अब मैंने एक मंत्र पढ़ा! इसको आमद-अमल कहा जाता है, मैंने मंत्र पढ़कर उसकी दिशा में फूंक मार दी, उसने मेरी तरफ झटके से गर्दन उठाई! उसकी काली पुतलियाँ गायब थीं, चढ़ा ली थीं उसने ऊपर! फिर हलके से मुस्कुराई!
"कौन है तू?" उसने मुझसे पूछा,
मैं कुछ नहीं बोला,
उसने फिर से गर्दन नीचे की,
मैंने फिर से मंत्र फूंका,
उसने फिर से गर्दन ऊपर उठायी, अबकी काली पुतलियाँ अपनी जगह थीं!
"कौन है तू?" उसने पूछा,
अब मैंने अपना परिचय दे दिया, देना पड़ा!
"क्या करने आया है?" उसने पूछा,
"कौन है तू ये बता?" मैंने कहा,
"क्या करेगा?" उसने नशे की सी हालत में पूछा,
"बकवास न कर, जल्दी बता?" मैंने कहा,
ना बोली वो कुछ भी!
फिर से झटके खाये और नीचे गिर गयी!
जो भी था या थी, अब नहीं था या थी, वो जा चुका था!
मैं फिर से अपनी जगह जा बैठा!



"ये..क....क्या है गुरु जी?" कांपते से बोले अशोक जी,
"कोई लपेट है अशोक जी, वही पता कर रहा हूँ" मैंने कहा,
"ये ठीक तो हो जायेगी न?" उन्होंने पूछा,
"हाँ, हाँ क्यों नहीं" मैंने कहा,
"मेरी बच्ची को बचा लो गुरु जी, बड़ा एहसान होगा आपका!" उनकी रुलाई फूट पड़ी ये कहते ही,
मैंने चुप किया उनको,
"आप ज़रा बाहर जाएँ, मैं मालूम करता हूँ" मैंने कहा,
वे बाहर गए तो मैंने दरवाज़ा बंद कर दिया अंदर से,
"शर्मा जी, वो लौंग का जोड़ा निकालिये" मैंने कहा,
"उन्होंने एक पोटली से लौंग का जोड़ा निकल लिया और मुझे दे दिया,
मैंने उस जोड़े को एक मंत्र पढ़ते ही जला दिया,
वो जल पड़ा,
जलते ही खड़ी हो गयी वो!
गर्दन नीचे किये हुए,
"अब बता कौन है तू?" मैंने पूछा,
वो हंसने लगी!
हंसती रही!
और तेज!
और तेज!
मैंने एक लौंग मंत्र पढ़कर मारी उसको, लौंग लगते ही वो चिल्लाई और वहीँ बैठ गयी!
फिर हंसने लगी!
अब मुझे गुस्सा आया!
"बताती है या बकवाऊं?" मैंने कहा,
"जो करना है कर ले" उसने धीरे से कहा,
"ठीक है, ऐसे नहीं मानेगी तू" मैंने कहा, और अब मैंने एक मंत्र पढ़ा, अपने एक महाप्रेत को बुलाने के लिए!
आश्चर्य वो हाज़िर नहीं हुआ!
मतलब ये ताक़त वैसी नहीं है जैसा मैंने अनुमान लगाया था!
उसने ताली मारी!
"नहीं आया!" वो बोली,
ताली मारी!
"नहीं आया! मेरा बच्चा नहीं आया!" वो बोली,
क्या?
बच्चा?
महाप्रेत बच्चा?
ये कौन है फिर?
"कौन है तू?" मैंने पूछा,
अब उसने एक अजीब सी भाषा बोली, बेहद अजीब, मुझे कुछ भी समझ नहीं आया, ख़ाकधूर!
"क्या हुआ रे?" उसने हँसते हुए कहा,
इस से पहले मैं जवाब देता वो लपक के मेरी और आयी और मुझे मेरे गले से पकड़ लिया! मेरे गले पैर उसके नाख़ून गढ़ गए, शर्मा जी ने छुड़ाने की कोशिश की तो उनको एक हाथ से धक्का देकर बिस्तर पर गिरा दिया! बड़ी भयानक स्थिति, वो गुस्सैल कुत्ते की तरह गुर्राए जा रही थी! संघर्ष ज़ारी रहा!
"बुला? किसको बुला रहा है, मैं भी देखूं?" उसने कहा,
अब मेरे पास कोई रास्ता नहीं था, मैंने तभी इबु का शाही रुक्का पढ़ा!
इबु! हाज़िर हुआ इबु! उसने आव देखा न ताव, नेहा को उठाया और सामने दीवार पर फेंक के मारा! मेरी गर्दन से रगड़ते नाखूनों ने खून निकाल दिया! इबु फिर बढ़ा और और उसको उठाया और फिर बिस्तर में मारा फेंक कर, दीवान का पाट टूटा और वो उसके अंदर!
इबु फिर भी नहीं रुका, उसको उसकी टांग से पकड़ा और फिर खींच कर बाहर निकला, तब तक उसके अंदर से वो बहार निकल चुकी थी या था, जो कुछ भी था!
गुस्से में फुफकारता हुआ खड़ा रह गया!
अब मैंने इबु को वहाँ से लोप किया,
तोड़-फोड़ और छीन-झप्पटा सुनकर सभी भागे वहाँ! दीवान टूटा था, वे घबराये, शर्म जी को मैंने देखा, उनका चेहरा छिल गया था, ऊँगली का नाख़ून फट गया था! और नेहा टूटे दीवान पर औंधे मुंह लेटी हुई थी!
"क्या हुआ गुरु जी?" अशोक ने कांपते कांपते पूछा,
"ये जो कोई भी है बहुत शक्तिशाली है" मैंने कहा,
"कौ...कौन है ये?" उन्होंने पूछा,
"अभी नहीं पता" मैंने कहा,
वे ठगे से रह गए!
"शर्मा जी के साथ मैं बहार निकला, अशोक भी आ गए बाहर, मेरा खून और शर्मा जी का हाल देखकर वे अब घबरा गए!
अब मैंने वो कमरा और उसका प्रवेश-द्वार कीलित कर दिया!
"डॉक्टर पर चलिए" मैंने कहा,
"जी" अशोक जी ने कहा,
हम डॉक्टर पर गए, टिटनेस के इंजेक्शन लगवाए और शर्मा जी का नाख़ून काट कर पट्टी कर दी डॉक्टर ने!
वापिस घर आये!
नेहा कमरे में कुछ गाना सा गा रही थी!
उसने हमको देखा!
हंसी! ताली मारी!
"तू फिर आ गया?" उसने पूछा,
"हाँ! तू भाग गयी थी ना, इसलिए?" मैंने कहा,
"भागी कहाँ?" उसने पूछा,
"बकवास ना कर" मैंने कहा,
अब वो हंसी! जैसे मैंने मजाक किया हो!


"मैं तो कहीं नहीं भागी?'' वो बोली,
"झूठ बोलती है?" मैंने कहा,
"मुझे किसका डर पड़ा जो भागूंगी?" उसने कहा,
अब मैं घूमा! घूमा इसलिए कि ये सच में ही नहीं भागी, भागा कोई और था, और ये कोई और थी, दो सवार थीं उस पर! अब मैंने जानने का प्रयास किया, ताकि कुछ हाथ लगे,
"कौन है तू?" मैंने पूछा,
"विमला" उसने कहा,
"कौन विमला?'' मैंने पूछा,
"बहादुरगढ़ वाली विमला, ये अशोक जानता है" वो बोली,
अब अशोक का रहा मुंह खुला!
ममता जैसे गिरने ही वाली थीं ज़मीन पर!
"कौन है ये विमला?" मैंने अशोक से पूछा,
"जी...जी..." शब्द न निकले मुंह से उनके,
"बताइये?" मैंने पूछा,
"जी...मेरी बहन, बड़ी बहन" वो बोले,
"हाँ! अब बोला कुत्ता!" नेहा ने हँसते हुए कहा,
कुत्ता?
एक बहन अपने भाई को कुत्ता क्यों बोल रही है?
"अशोक जी? इसने आपको कुत्ता क्यों कहा?" मैंने पूछा,
"इसकी बनती नहीं थी हमारे परिवार से" वे बोले,
"झूठ बोलता है कुत्ता!" नेहा ने कहा,
"झूठ कैसे?" मैंने पूछा,
"इसने पैसा नहीं दिया मेरा, मेरा घर गिरवी पड़ा था, आदमी मेरा था नहीं, इसको मालूम था, बीमार पड़ी मैं बहुत, मैं चल बसी, मेरा बेटा इसके पास आया इसने झूठ बोला कि कोई पैसा नहीं लिया, पूछो इस से?" वो गुस्से से बोली,
"क्या ये सच है?" मैंने पूछा अशोक से,
"हा..जी" वे बोले,
चेहरा फक्क!
हालत पस्त!
रंगे हाथ पकड़ा गया हो चोर जैसे!
"कितना पैसा लिया था?" मैंने पूछा,
"पांच लाख" वे बोले,
"कब?" मैंने पूछा,
"दस साल हुए" वे बोले,
"हम्म, किया तो आपने बहुत ही गलत, और भुगत रही है बेचारी ये लड़की" मैंने कहा,
"विमला?" मैंने पूछा,
"हाँ?" उसने कहा,
"तेरे पैसे मिल जायेंगे तुझे मय ब्याज" मैंने कहा,
वो रो पड़ी!
रोते रोते जो समझ आया वो यही कि अब उसका लड़का भी ज़िंदा नहीं था, उसने आत्महत्या कर ली थी,
बहुत बुरा हुआ था,
मैं भी परेशान हो गया,
अशोक की रुलाई फूट पड़ी,
दोषाभिव्यक्ति से!
"विमला?" मैंने पूछा,
"हाँ?" उसने कहा,
"तुझे किसी ने भेज या तू स्व्यं आयी यहाँ?" मैंने पूछा,
"खुद आयी हूँ" उसने कहा,
इतना कहा और धम्म से गिर पड़ी नेहा!
चली गयी विमला!





ये विमला थी तो पहले कौन था?
ये क्या हो रहा था?
नेहा कहाँ है?
बड़ा अजीबोगरीब किस्सा हो चला था ये!
तभी फिर से हरक़त हुई उसमे! कमर अकड़ गयी उसकी और फिर उठ बैठी!
"कौन?" मैंने पूछा,
"सलाम उस्ताद!" उसमे से एक मर्दाना आवाज़ आयी!
मैं चौंका!
"कौन?" मैंने पूछा,
"इकराम हूँ साहब मैं!" उसने बताया,
अब जैसे मेरे ऊपर पानी का बड़ा सा भांड फूटा, जैसे आँखें खोलने का मौका भी नहीं मिला और फुरफुरी चढ़ गयी!
"कहाँ से आये हो?" मैंने पूछा,
"यहीं से, हुमायुंपुर से ही?" उसने हंस के कहा,
"अच्छा, यहाँ क्या कर रहे हो?" मैंने पूछा,
"तफरीह!" उसने कहा,
बड़ा बेबाक था!
"किसने भेजा इकराम तुझे?" मैंने पूछा,
"भेजा किसी ने नहीं है साहब, बस जगह खाली थी सो चला आया!" उसने कहा,
"खाली जगह?" मैंने पूछा,
"हाँ जी" उसने कहा,
"समझाओ मुझे तफ्सील से?" मैंने कहा,
"लीजिये, यहाँ भीड़ खड़ी है साहब!" उसने कहा,
"कौन कौन है?" मैंने पूछा,
"अभी बताता हूँ" उसने कहा,
फिर नेहा ने अपनी उँगलियों पर गिना!
"जी यहाँ पर मेरे यार है तीन" वो बोला,
"कौन कौन?" मैंने पूछा,
"जी बजा माफ़ करे, एक मैं हूँ इकराम, दूसरा मेहबूब, तीसरा अशरफ और चौथा एहसान" उसने बताया,
मुझे झटका लगा!
खाली जगह!
अब मैं समझ गया!
समझ गया सारा मसला!
नेहा सवारी थी और ये सारे सवार!
वाह!
भाई वाह!
जो भी खिलाड़ी था बेहद मुलव्विस खेल खेल रहा था!
क्या कहने!
"इकराम, मियाँ बात ऐसी है, अभी इसी वक़त आप और आपके यार, तशरीफ़ ले जाएँ, मुनासिब होगा!" मैंने कहा,
"जी साहब! गुस्सा न करें, अब हमारी क्या बिसात! हम चले यहाँ से, बजा माफ़ करे!" उसने कहा,
चार झटके खाये उसने और साफ़!
अब मैंने शर्मा जी को वहीँ रखा और सभी को बाहर किया वहाँ से, और फिर मैंने बाल पकडे उसके! और इबु का शाही-रुक्का पढ़ दिया!
इबु ज़र्र से हाज़िर हुआ!
मैंने उस से 'जगह' साफ़ करने को कहा!
और अब इबु ने लगाईं झाड़!
एक एक को फेंका उसने!
न जाने कितने सवार!
मचा दी चीख पुकार!
मैंने अब इबु को वहीँ मुस्तैद कर दिया और फिर एक धागा बनाया! धागा अभिमंत्रित किया और नेहा के गले में बाँध दिया! कुछ घंटों के लिए अब कोई सवार नहीं अ सकता था!
अब इबु भी वापिस हो गया!
अन!
सबसे बड़ा सवाल!
कौन है वो खिलाड़ी?
 
 
खिलाड़ी!
कौन है ये खिलाडी? जो परदे के पीछे से सारी चाल चल रहा है, बेहद करीने से! मानना पड़ेगा, बहुत कुशल और चालाक खिलाड़ी है! उसने नेहा कि रूह पर कब्ज़ा कर लिया है, और फिर उसको कैडि सा बना कर जगह खाली कर दी है, आये कोई भी आये! ये विद्या काहूत कही जाती है! बदला लेने की ये ज़बरदस्त कारीगरी है! अब यही खोजना था!
नेहा शांत लेटी थी, एक दम शांत, मैंने उसके माँ-बाप को अब बुला लिया अंदर, अब
मैं उसको होश में लाने वाला था इसीलिए,
"नेहा?'' मैंने कहा,
वो अलसाई!
"खड़ी हो जाओ" मैंने कहा,
वो कसमसाई, अपने आप में सिमटी,
"उठो?" मैंने कहा,
वो उठ गयी, अंगड़ाई लेते हुए! हमे देख घबरा गयी! हम अनजान थे उसके लिए, उठते ही उसने अपनी चुन्नी ढूंढी जो उसको उसी माता जी ने दे दी, वो समझ नहीं पायी कि आखिर हम कौन लोग हैं और क्यों आये हैं?
"अब कैसी हो?" मैंने पूछा,
"ठीक" उसने कहा,
मुझे तसल्ली हुई!
"नेहा, कुछ सवाल पूछूंगा, मुझे उसके सही सही जवाब देना" मैंने कहा,
अब वो अनजान को सवाल के जवाब क्यों दे?
आखिर में उसके पिता जी ने सारी बात समझायी, वो हुई तो परेशान लेकिन फिर हामी भर ली!
"क्या करती हो?" मैंने पूछा,
"चार महीने पहले नौकरी शुरू कि है एक बीमा एजेंट के यहाँ, साथ ही साथ पढ़ाई भी चल रही है" उसने बताया,
अब शर्मा जी तैयार थे कागज़ और कलम लिए, उन्होंने विवरण लिख लिया,
"कौन है ये बीमा एजेंट?" मैंने पूछा,
"अजय सक्सेना" उसने बताया,
"क्या उम्र होगी?" मैंने पूछा,
"कोई चालीस साल" वो बोली,
"कहाँ रहता है?" मैंने पूछा,
"यहीं रोहतक में" उसने बताया,
"कितने लोग काम करते हैं वहाँ और?" मैंने पूछा,
"चार लोग" उसने बताया,
"और कौन लड़की है वहाँ?" मैए पूछा,
"तीन और हैं" उसने कहा,
"शादी शुदा हैं सभी?" मैंने पूछा,
"दो हैं, एक नहीं" उसने बताया,
अब मैंने सभी के नाम लिख लिए, अर्थात शर्मा जी ने लिख लिए,
"किस के साथ अंतरंगता है तुम्हारी?" मैंने पूछा,
"एक लड़की मनीषा से" मैंने पूछा,
"तुमसे बड़ी है या छोटी?' मैंने पूछा,
"बड़ी है" उसने बताया,
अभी तक तो कोई संदिग्ध नहीं मिला था!
"नेहा, कोई प्रेम-सम्बन्ध है तुम्हारा?" मैंने पूछा,
अब वो चुप!
"चुप न रहो, तुम्हारी जान पर बनी है, समझ जाओ?" मैंने कहा,
अब वो चुप फिर से!
"मुझे बताओ?" मैंने कहा,
"नहीं" उसने कहा,
"झूठ" मैंने कहा,
"नहीं, कोई सम्बन्ध नहीं" उसने कहा,
"फिर से झूठ" मैंने टटोला उसको,
"विश्वास कीजिये" वो बोली,
"ठीक है" मैंने कुछ सोच के बोला,
"तुम बीमार हो?" मैंने पूछा,
"हाँ" उसने गर्दन हिलायी,
"कहीं बाहर गयी थीं?" मैंने पूछा,
"नहीं" उसने उत्तर दिया,
"कुछ बाहर खाया था?" मैंने पूछा,
"नहीं" उसने बताया,
कुछ हाथ नहीं लगा पेंच!
अब कुछ नाम जो आये थे, उनकी जांच करनी थी! हो सकता था कुछ हाथ लग जाए!
"ठीक है, तुम नहा-धो कर आओ पहले" मैंने कहा,
वो उठी और चली गयी अपनी माँ के साथ!

मुझे एक खाली कमरा चाहिए" मैंने अशोक से कहा,
"जी" वे बोले, उठे और चल दिए, हम दोनों उनके पीछे पीछे चल दिए,
उन्होंने एक कमरा दिखा दिया, कमरा खाली था, बस कुछ सामान रखा था वहाँ, उस से कोई परेशानी नहीं थी,
"ये ठीक है" मैंने कहा,
अब शर्मा जी और अशोक को बाहर भेजा मैंने, एक चादर बिछायी और
मैं कुछ पढ़ने बैठ गया, एक महाप्रेत का आह्वान किया, ये कारिंदे की तरह से काम करता है, नाम है जल्लू, जल्लू हाज़िर हुआ, मैंने उसको उद्देश्य बताया, उसने सुना और फुर्र हुआ, दूसरे ही क्षण वापिस आ गया, और उसने मुझे एक नाम बताया, गोविन्द, बस! इतना बताते ही वो लोप हो गया, भोग उधार कर गया! अब इस नाम से कुछ पता नहीं चल सकता था, हज़ारों गोविन्द होंगे, अब क्या कौन और कहाँ हैं और कैसे सम्बंधित है नेहा से, क्या पता? इसलिलिये मैंने अब सुजान को हाज़िर किया, सुजान टकराऊ है, सुनता है और समझता है, सुजान हाज़िर हुआ, और अपना उद्देश्य जान वो चला वहाँ से! अब मुझे इत्मीनान हुआ!
कुछ देर हुई!
करीब दस मिनट!
और सुजान वापिस हुआ!
और जो सुजान ने जानकारी दी वो वाक़ई हैरत में दाल देने वाली थी!
सारी गलती इस लड़की नेहा की थी!
दरअसल नेहा के एक लड़के गोविन्द से प्रेम-सम्बन्ध थे, ये मैं जानता था, उसके भाव सबकुछ बता चुके थे, और नेहा उस लड़के पर निरंतर दबाव बनाती थी कि वो शादी का प्रस्ताव लेकर अपने माँ-बाप के साथ उसके घर आये, गोविन्द का भी कोई पक्क रोज़गार नहीं था, पिता पर आश्रित था, दो बड़े भाई थे, एक अविवाहित था, पिता के व्यापार में सभी साझी थे, तो विावह उस समय नहीं हो सकता था, निरंतर त्रस्त रहने से गोविन्द ने ये बात अपने मामा को बताई, उसने मामा अखिल ने इस लड़की नेहा का मुंह बंद करने के लिए एक खिलाडी बाबा असद को चुना और ये लड़की उस चतुर बाबा असद के चंगुल में आ गयी! अब ये बाबा असद की चौपड़ की गोटी थी! बाबा असद इसको जब चाहे, जहां चाहे चल ले!
जड़ पकड़ में आयी तो अब उखाड़ना भी बाकी था, सो मैंने अब रणनीति बनाना आरम्भ किया! मैंने ककश से बाहर आया, शर्मा जी और अशोक वहीँ खड़े थे, मैंने शर्मा जी को अंदर बुला लिया और सारी कहानी से अवगत करा दिया! उनको भी हैरत हुई! नेहा ऐसी लगती नहीं थी!
"अब क्या किया जाए?" मैंने पूछा,
"सबसे पहले तो अशोक को खबर की जाये, फिर इस बाबा असद की खबर लीजये" वे बोले,
"हाँ, ये सही है" मैंने कहा,
अब शर्मा जी ने अशोक को बुलाकर सारी बात बता दी अशोक को! अशोक को तो घड़ों पानी फिर गया, आँखों से आंसू निकल आये!
शर्मा जी ने समझाया बुझाया!
"चलो, अब नेहा से बात करते हैं" मैंने कहा,
"चलिए" अशोक ने कहा,
अब हम नेहा के कमरे में आये, वो नहा-धो कर बैठी थी, साथ में उसकी माता जी भी! हम वहीँ बैठ गए!
"नेहा?" मैंने कहा,
"जी?" वो चौंकी,
"ये गोविन्द कौन है?" मैंने पूछा,
कपडा सा फट गया!
उसको जैसे दामिनी-पात हुआ!
"नहीं पता?" मैंने पूछा,
होंठ चिपक गए उसके!
"बताओ?" मैंने कहा,
अब सबकी निगाह टकराई उस से!
"कौन है ये गोविन्द?' मैंने पूछा,
"म...मुझे नहीं मालूम" वो बोली,
"नहीं मालूम?" मैंने ज़ोर से पूछा,
"नहीं" उसने कहा,
"तुम्हारा प्रेमी नहीं वो?" मैंने अब स्पष्ट किया,
वो चुप!
"बताओ?" मैंने पूछा,
नहीं बोली कुछ!
"ठीक है, अब देखो उसका क्या हाल होता है, जैसा उसने तुम्हारे साथ किया वैसा ही उसके साथ होगा!" मैंने कहा,
प्रेम था तो घबराहट भी होनी ही थी! सो घबरा गयी!
"इसकी नौकरी छुड़वाओ, घर पर बिठाओ और आनन्-फानन में जो रिश्ता मिले इस घर से विदा करो" मैंने जानबूझकर ऐसा कहा,
"जी" अशोक ने समर्थन किया!
"जी, मैं केवल आपसे बात करना चाहती हूँ" नेहा ने कहा,
"नहीं, सबके सामने कहो" मैंने कहा,
फिर से चुप!


अब सबके सामने बात कैसे हो? संकोच जो था! माँ-बाप से छुपाओगे तो यही होगा ना? पुत्र-पुत्री को माता-पिता से और पति को पत्नी से और पत्नी को पति से कभी कुछ नहीं छिपाना चाहिए, गलती भी हो जाए तो बता देना चाहिए अन्यथा परिणाम गम्भीर ही होता है, और यही हुआ था नेहा के साथ, उसने एक तरह से दबाव बनाया गोविन्द पर, और अल्प-बुद्धि गोविन्द जब समझाने से हारा नेहा को तो उसने ये निर्णय लिया!
"बोलो अब?" मैंने कहा,
अब कुछ ना बोले वो!
"बताओ बेटी?" अशोक ने कहा,
माँ पास जा बैठी, सीने से लगाया और पूछा,
अब बोलने लगी नेहा!
सब क़ुबूल कर लिया उसने!
मुझे तसल्ली की साँसें आने लगीं!
'अशोक साहब?" मैंने पूछा,
"हाँ जी?" वे चौंके,
"यदि लड़के के माँ-बाप मान जाएँ विवाह हेतु तो क्या आप विवाह के लिए तैयार हैं नेहा के उस लड़के गोविन्द से?"
"मुझे कोई आपत्ति नहीं" वे बोले,
"ले देख नेहा!" मैंने कहा,
संकोच!
"ले, यदि तूने पहले बता दिया होता तो ये दिन ही नहीं आता, तू काहे परेशान होती?" मैंने कहा,
ग्लानि भावना!
"शर्मा जी, तैयार हो जाइये, अशोक जी आप भी" मैंने कहा,
"मैं तैयार हूँ" अशोक बोले,
दरअसल हमे जाना था बाबा असद के पास! बाबा असद का पता दे दिया था हमको कारिंदे ने!
अब हम चल पड़े वहाँ से! एक बात और, नेहा के पास अभी तक कोई नहीं आया था!
बाबा असद, रोहतक से थोडा दूर दिल्ली-बाय पास के समीप रहता था, हमने फ़ौरन गाड़ी स्टार्ट की और चल दिए!
घंटे भर में वहाँ पहुंचे, रास्ता साफ़ था, सीधे बाबा असद के पास पहुंचे, कोई दिक्कत नहीं हुई!
बाबा असद अपने घर में ही था, छोटा सा घर!
हम घर में घुसे, वो तखत पर बैठा था!
"आइये आइये!" वो बोला और उठा!
करीब साठ का रहा होगा वो!
हम बैठ गए वहाँ, उसने पानी मंगवा लिया, हमने पानी पिया!
"अब ठीक है लड़की?" उसने पूछा,
होश उड़े अशोक के!
"हाँ" मैंने कहा,
"चलो, बड़ी अच्छी बात है" वो बोला,
उसमे कपट नहीं था! क़तई नहीं!
"वैसे बाबा, लड़की मर जाती तो?" मैंने पूछा,
"नहीं, आप तो जानकार हैं, जब आपने छुआ तो मैं समझ गया, और हाँ मियादी कम था, केवल लपेट लगाईं थी, मैं भला क्यों मारूंगा, मैंने तो लड़के को कहा था, कि ये गलत है और तू अपने माँ-बाप से बात कर और मना उन्हें, ब्याह करना ही होगा तुझे" बाबा ने कहा,
ये सच था!
"तो उसने बात की?" मैंने पूछा,
"हाँ, उनके बड़े लड़के का भी रिश्ता तय हो गया है, अब दोनों लड़कों की शादी दो रोज आगे पीछे करेंगे वो! अब आपके पास भी आने ही वाले होंगे!" बाबा ने हंस के कहा,
मैंने यक़ीन किया!
बाबा असद ने फ़ोन किया लड़के के मामा अखिल को, और बुलवा लिया वहाँ, आधे घंटे में पहुँच जाने थे वो!
अब तक चाय और बिस्कुट मंगवा लिए थे बाबा असद ने, हमने चाय भी पी और बिस्कुट भी खाये!
"आजकल का वक़्त बहुत बदल गया है जी, हमारे वाला ज़माना नहीं रहा, अब सब अपनी अपनी मनमर्जी करते हैं, ये लड़का और लड़की अपने अपने घर में बात कर लेते तो ये नौबत कहाँ होती" वे बोले,
"सही कहा जी" मैंने कहा,
"चलो देर आये दुरुस्त आये" वे बोले,
"मैंने लड़के को समझाया था, लक बहुत घबराया हुआ था, लड़की ने ख़ुदकुशी की धमकी दी थी बेचारे को, अब मुझे ऐसा करना ही पड़ा, आप मुझे माफ़ करें, बच्ची हमारे घर में भी है, जैसी आपकी बेटी ऐसी मेरी बेटी, मैंने लड़के को धमकाया भी था, कोई चालगुरेजी की तो रूह को भी सजा दूंगा उसकी!" वे बोले,
लाख पते की बात!
आधा घंटा बीता नहीं होगा कि अखिल भी आ गए वहाँ, परिचय हुआ, बाबा असद ने हमारा ही पक्ष लिया और तज़वीज़ की कि हमको गोविन्द के माँ-बाप से मिलवा दें, बात तय हो जाये तो एक घर बसे! हमने बाबा असद को भी साथ ले लिया, वो ख़ुशी ख़ुशी तैयार हो गए, तैयार इसलिए कि खुद बताएं गोविन्द के माँ-बाप को कि लड़का क्या करवाने आया था अपने मामा के साथ!
और फिर वही हुआ! हम सभी पहुंचे गोविन्द के घर! गोविन्द ने बात कर ली थी अपने घर में! और अब बाबा असद ने सारी बात दोहरा दी! उसके माँ-बाप गोविन्द पर बड़े गुस्सा हुए, बेहद शालीन थे उसके माता-पिता! कुल मिलाकर बात पक्की या रिश्ता पक्का हो गया! आगे का कार्यक्रम भी पक्का हो गया!
बाबा असद को दोनों तरफ से निमंत्रण मिला, बाबा ने नेहा के तरफ से ही निमंत्रण माना और घराती हो गए!
सबकुछ निबट गया!
वर्ष २०१३ में दोनों परिणय-सूत्र में बंध गए! बाबा असद से मेरी मित्रता हो गयी! अब उनका मेरा आना जाना हैं!
नेहा और गोविन्द सभी खुश हैं!
जो मेरा कर्त्तव्य था, मैंने निभा दिया!
साधुवाद!
    


















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महिलाओं के लिए सेक्स के लाभ





  • महिलाएं सेक्‍स के दौरान न सिर्फ आंनद का अनुभव करती है बल्कि सेक्‍स से उन्‍हे कई प्रकार के शारीरिक और भावनात्‍मक लाभ भी होते है, सेक्‍स से महिलाओं के शारीरिक सरंचना में भी परिर्वतन आता है। सेक्‍स के दौरान अपने पार्टनर द्वारा मिले शारीरिक और भावनात्‍मक सर्पोट से महिलाओं में आत्‍मविश्‍वास बढ़ता है। यूं तो महिलाओं में हमेशा सेक्‍स की चाहत होती है, लेकिन मासिक पूरा हो जाने के पांच से सात दिन तक महिलाएं सेक्स के मूड में ज्यादा होती हैं क्योंकि मासिक चक्र पूरा होने के बाद सेक्स वाले हार्मोस सक्रिय हो जाते हैं। महावारी के पांच से सात दिन में सेक्स करना ज्यादा ही आनंद की अनुभूति कराता है साथ ही इसका लाभ कम से कम 12 दिनों तक रहता है। महावारी के बाद महिलाओं में सेक्स की तीव्र इच्छा जागृत होना स्वाभाविक है, क्योंकि इन दिनों में गर्भधारण की संभावना कम हो जाती। वैसे तो यह शारीरिक जरूरत का एक आम हिस्‍सा है। सेक्स वैवाहिक संबंधों को सुखी बनाता है और भविष्य में दोनों के बीच सेक्स को लेकर दूरियां कभी नहीं आती। आइए इस अर्टिकल के माध्‍यम से जानें कि महिलाओं को सेक्‍स से क्‍या लाभ होते हैं।
  • महिलाओं के लिए सेक्स के लाभ

  • यह एक शारीरिक व्‍यायाम है जो आपको स्‍वस्‍थ रखता है। जीं हां महिलाओं में सेक्‍स के दौरान से शरीर में कैलोरी का जलन होता है यानी सेक्‍स शरीर का वजन कम करने में मददगार होता है। इससे महिलाओं का वजन कम होता है।
  • महिलाओं में सेक्स उन्मुक्ति को बढ़ाता है, और एक अलग ही आनंद का अनुभव कराता है।
  • सेक्‍स कई बीमारियों को कम करता है और अन्य बीमारियों के संक्रमण से शरीर की प्रतिरक्षा करता है, और महिलाओं को स्‍वस्थ बनाता हैं।
  • सेक्स तनाव को कम करता है और महिलाओं को खुश रखने में मदद करता है।
  • महिलाओं में सेक्‍स रक्तचाप को भी कम करता हैा सेक्‍स से रक्‍तचाप नियंत्रित रहता है और कई प्रकार की बीमारियों से मुक्ति मिलती है।
  • सेक्स दिल को मजबूत बनाता है, जिससे दिल से जुड़ी बीमारियों की संभावना कम होती एक सप्ताह में सेक्स दो बार या दो से अधिक बार सेक्‍स करने से महिलाओं में घातक दिल के दौरे की संभावना उन महिलाओं के तुलना में कम हो जाती है, जो कम सेक्स करती हैा
  • सेक्स महिलाओं में आत्मसम्मान को बढ़ाता है।
  • सेक्स अंतरंगता और रिश्तों को बेहतर बनाता है। वैवाहिक जीवन को मजबूत बनाता है।
  • सेक्स करने से कई बीमारियों के दर्द से राहत मिल सकती हैं, जैसे गठिया, सिर दर्द इत्‍यादि में सेक्स के बाद कुछ राहत पा सकते हैं।
  • सेक्स महिलाओं कैंसर, सिस्‍ट जैसी बीमारियों के भी खतरे को भी कम करता है।
  • महिलाओं में सेक्स पेल्विक मांसपेशियों को मजबूत बनाता है। संभोग के दौरान उनकी पेल्विक मांसपेशियों का व्यायाम होता है जिससे महिलाओं में यूरीन असंयम का जोखिम कम हो जाता है।
  • बेहतर नींद के लिए सेक्स जरूरी है। संभोग के बाद, महिलाओं को बेहतर नींद आती है और स्वास्थ्य लाभ होता है।
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सेक्स, सम्भोग कैसे करें


सेक्स कैसे किया जाए.. अपने पार्ट्नर को कैसे अधिकाधिक सेक्स संतुष्टि दी जाए ये वो प्रश्न हैं जिसके ऊपर बहुत सी जगह पर टॉपिक स्टार्ट किए गए.. मगर कहीं पर भी इन पर तसल्लीबक्श उत्तर नहीं मिले।
मैंने ढूँढने की बहुत कोशिश की.. पर मुझे कहीं नहीं मिले। इसलिए इतने आवश्यक मुद्दे पर मैंने काफ़ी रिसर्च की और अब ‘सेक्स कैसे करना चाहिए’ इस टॉपिक पर कुछ लिखने की कोशिश कर रहा हूँ। मुझे उम्मीद ही नहीं.. पूरा यकीन है कि ये मेरी ‘सेक्स कैसे करें’ के बारे में लिखी गई ये पोस्ट आपकी जरूर हेल्प करेगा।
लेकिन अपनी बात शुरू करने से पहले ही मैं ये क्लियर कर देना चाहता हूँ कि मैं कोई एक्सपर्ट या कोई स्पेशलिस्ट नहीं हूँ। मैं यहाँ बस वो बातें शेयर कर रहा हूँ.. जो मैंने ‘सेक्स कैसे करें’ टॉपिक के बारे में रिसर्च करते हुए समझे और जो अपने पर्सनल एक्सपीरियेन्स से सीखे।
तो चलिए शुरू करते हैं।
एक बेहतरीन सेक्स सम्बन्ध के लिए दोनों पार्ट्नर्स का एक-दूसरे से खुला होना बहुत ही ज़रूरी है.. इससे सेक्स में अगर कहीं भी हिचकिचाहट आने की संभावना होती है.. तो वो दिक्कत तुरंत सुलझ जाती है। लेकिन अगर आपस में खुलापन ना हो.. तो कोई शारीरिक दिक्कत होने पर पार्ट्नर एक-दूसरे से अपनी समस्या को लेकर कोई भी डिस्कस नहीं कर पाते हैं और दिक्कत और भी बढ़ जाती है.. और बाद में ये नासूर बन जाती है।
जैसे कि.. मेल सेक्स ऑर्गन (लिंग) का नाम लेना पुरूष के लिए बहुत आसान होता है.. लेकिन जब बात महिला या लड़की की आती है.. तब वो उस शब्द को यूज करने से कतराती है। हालाँकि.. आजकल ज़माना बदल रहा है और लड़कियाँ भी किसी से कम नहीं हैं.. फिर भी एक अच्छे संस्कार वाली औरत या लड़की ऐसे शब्दों को लेने में जरा कतराती है..। इसी के चलते जब उसे अपने पार्ट्नर के सेक्स ऑर्गन से कुछ दिक्कत होगी.. तो वो बोल नहीं पाएगी या बताने में दिक्कत महसूस करेगी।
एक उदाहरण के लिए सोचिए.. किसी की नई-नई शादी हुई है और वाइफ को ये डर है कि जब सेक्स होगा तो बहुत दर्द होगा.. तो उस वक़्त पति की ये ड्यूटी है कि वो पत्नी का डर दूर करे और सेक्स इस प्रकार आराम से करे कि पत्नी को दर्द ना हो.. या कम से कम दर्द हो। इसके लिए आयल यूज करें.. क्योंकि अगर उसे दर्द हुआ तो उसका डर उसके ज़हन में हमेशा के लिए बैठ जाएगा.. अतः पति को पत्नी के भ्रम और डर को दूर करना ही होगा।
आपने गौर किया होगा कि जब हम किसी भी चीज़ का नाम लेते हैं तो उसकी एक तस्वीर हमारे ज़हन में एकदम से बन जाती है और इसके साथ ही आपका दिमाग़ तुरंत ही उस चीज़ से जुड़ी पॉज़िटिव और निगेटिव फीलिंग से भी इनफॉर्म कर देता है। अब सेक्स ऑर्गन्स के बारे में भी कुछ ऐसा ही होता है।
पुरुषों और महिलाओं दोनों के ही सेक्स ऑर्गन्स का नाम आम सोसाइटी में पब्लिक्ली यूज करना किसी भी तरह से अच्छा नहीं समझा जाता है। अक्सर बेशरम और बदतमीज़ लोग सेक्स ऑर्गन्स को गाली गलौच में बोल देते है। लेकिन वह एक शरीफ़ और शर्मोहया वाली महिला कैसे इन चीजों के नाम लेने को पॉज़िटिवली ले सकती है?
हाँ अगर आप इन सेक्स ऑर्गन्स के नाम खुद से ही कुछ बना कर रखते हैं तो इनका निगेटिव असर कम हो जाएगा और पत्नी किसी झिझक के बिना वो नाम बोल सकेगी। जैसे कि पुरुष के लिंग को बादशाह और महिला के प्राइवेट पार्ट को मल्लिका कहें.. तो बहुत अच्छा रहेगा। आप खुद ‘बादशाह’ शब्द की तुलना उस नाम से करके देखो.. जिस नाम से आप उसका नाम अपनी भाषा में बचपन से सुनते और सुनते आ रहे हों.. तो आपको खुद ही महसूस होगा कि ये एक बहुत अच्छा आइडिया है।
आप सेक्स ऑर्गन्स के नाम बादशाह और मल्लिका के अलावा भी अंग्रेजी या अपनी भाषा में कुछ भी रख सकते हो.. बस नाम अच्छे होने चाहिए। इससे पति और पत्नी कुछ टाइम बाद खुल कर बातचीत कर सकते हैं। इसी तरह से सम्भोग क्रियाओं के नाम बोलने की बजाए लव और प्यार का शब्द इस्तेमाल करें।
जैसे कि अगर रात को सेक्स का प्रोग्राम हो तो आप पत्नी को कहो ‘आज रात को मैं आपसे प्यार करूँगा..’ इसका असर उससे कहीं अच्छा होगा.. अगर ये कहें कि ‘मैं आज तुमसे सेक्स करूँगा..’ इसलिए ये कहें कि ‘आई विल मेक लव यू’ बजाए ‘आई विल हैव सेक्स विद यू..’विवाहित और लव कपल्स सेक्स कैसे करें
कुछ लोग ये समझते हैं कि फोरप्ले से सेक्स की शुरूआत होती है.. मगर फॉरप्ले से पहले चंद बातों का ख़याल रखना बहुत ज़रूरी है।
वो इस प्रकार है-
1- ये बेहतर होगा अगर आप मॉर्निंग में ही डिसाइड कर लें कि आज की रात ज़िंदगी की एक हसीन रात होगी। ये एहसास दिन भर पत्नी (पार्ट्नर) के दिल में फूल खिलाते रहेंगे।
2- अगर आप शेव करते हैं तो आप उस शाम को ज़रूर शेव करें।
3- उस दिन ड्रेस का ख़ास ख्याल रखें.. पार्ट्नर वो वाला ड्रेस पहनें जो आपके पार्ट्नर को पसंद हो.. ना कि सिर्फ़ अपनी पसंद का ड्रेस पहनें।
4- एक अच्छी खुश्बू मोहब्बत के इस हसीन लम्हों को और हसीन कर देती है। मगर इस में भी वो वाली खुश्बू पसन्द करनी चाहिए.. जो दोनों को पसंद हो वरना इस का असर विपरीत भी हो सकता है।
5- पति को इंप्रेस करने के लिए पत्नी को शाम को खूबसूरत सा मेकअप करना चाहिए.. साथ ही लिपस्टिक का कलर वो वाला हो.. जो पति को सबसे ज़्यादा पसंद हो।
6- दोनों पार्ट्नर्स को नहाना चाहिए और जिस्म के गैरज़रूरी बालों की सफाई ज़रूर करनी चाहिए।
7- बेडरूम का वातावरण बहुत ही अहम रोल अदा करता है.. इसलिए कमरे में हल्की रोशनी का इंतज़ाम होना चाहिए। हो सके तो ऐसे समय पर कमरे में जीरो वॉट का रेड कलर का बल्ब रोशन करें.. इससे आपको कमरा और भी प्यारा-प्यारा सा लगेगा और हसीन रात और भी हसीन हो जाएगी।
8- ऐसी हर चीज़ को बंद कर दें.. जो आपको डिस्टर्ब कर सकती है। सेलफोन ऑफ कर दें.. पीसी.. लॅपटॉप और टीवी बंद कर दें।
9- अगर आप म्यूज़िक के दीवाने हैं तो मोहब्बत भरे गानों की एक बढ़िया सी प्लेलिस्ट बैकग्राउंड में प्ले कर दें.. बहुत ही कम आवाज़ मे… इससे एक तो आपका मूड अच्छा रहेगा और बेडरूम की आवाज़ बाहर भी नहीं जाएगी।
10- कमरे में उस वक्त की ज़रूरत की चीजें जैसे कन्डोम।आयल और साफ़ कपड़े या टिश्यूस का होना भी ज़रूरी है।
नोट : आयल स्वास्थ्य की नजर से अनुचित होता है और इससे गुप्तांगों में इन्फेक्शन भी हो सकते हैं। डॉक्टर्स भी आयल इस्तेमाल करने से मना करते हैं।
जब सम्भोग का समय आए.. उससे पहले अपना मुँह और दाँत ज़रूर साफ़ करें.. जिससे आपकी सांसों की महक फ्रेश हो जाए।
अपने आपको अनड्रेस करते समय भी अपने ड्रेस ठीक से अरेंज करके रखें क्योंकि यदि अचानक एकदम किसी एमर्जेन्सी में आपको जल्दी कपड़े पहनने पड़ें.. तो ऐसा ना हो कि आप ढूँढते रह जाओ.. ये चीज़ किधर गई.. वो किधर गई।
सम्भोग के बाद अगर दुबारा सम्भोग करना हो.. तो एक बार फेश हो कर और वापस बेड पर आ जाएं.. और गपशप करें कुछ ड्राइफ्रूट आदि जैसी चीज़ जो आपको फ्रेश कर दें.. कोई मीठी चीज़ खा लें..
ram naresh Web Developer

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योनि शैथिल्य : एक प्रमुख यौन समस्या



मेरा परिचय तो आप जानते ही हैं, रितेश शर्मा, मैं ताजनगरी आगरा का रहने वाला हूँ।
दोस्तो, मैं आज फिर हाजिर हूँ एक और नई सेक्स समस्या के साथ जिसका नाम है – योनि का ढीलापन या योनि शैथिल्य
यह महिलाओं की एक प्रमुख समस्या बन चुकी है.
वैसे तो प्रेगनेंसी के बाद लगभग हर महिला को इसका सामना करना पड़ता है किन्तु इसके अलावा और भी कई कारण हैं जिनसे योनि ढीली हो जाती है।
इसका सीधा असर उनके पति पर पड़ता है, पति को सेक्स करने में मज़ा बिल्कुल नहीं आता क्योंकि उन्हें अपना लिंग योनि में डालने पर बिल्कुल कसावट महसूस नहीं होती और महिलाओं को भी उनकी योनि के अंदर लिंग होने पर भी मज़ा और उत्तेजना महसूस नही होती।
इधर पुरुष को लगता है कि उसकी पत्नी की योनि बहुत ढीली हो चुकी हे और मज़ा नहीं आता और वो अपने लिए दूसरी सेक्स साथी तलाशने की
कोशिश करता हैं, उधर पत्नी सोचती है कि उनके पति अब उसे सन्तुष्ट नहीं कर पाते और वो भी किसी दूसरे मर्द की ओर बहकती हैं।
नतीजा उनका विवाहोपरांत तन के मिलन का रिश्ता समाप्त और विवाहेत्तर रिश्ता शुरू..
कैसे मालूम हो कि योनि ढीली है?
1.आप अपनी योनि में पति के लिंग से बड़ी वस्तु के डालने पर ही उत्तेजना महसूस करती हैं. आपको तर्जनी उंगली से योनि को उत्साहित कर पाने में कठिनाई हो रही है!
2.आप बिना कोई प्रतिरोध के साथ अपनी योनि में तीन या अधिक अंगुलियों डाल सकते हैं!
3. आपको साथी के साथ सम्भोग करते समय योनि में किसी भी प्रकार की उत्तेजना न आना!
4. आपके साथी को सम्भोग करते समय योनि ढीली महसूस होना!
5. योनि होंठ बाहर उभर गए हैं और यह दूसरे होठों की तरह लग रहे हैं!
6. आपकी योनि पूरी तरह से बंद नहीं होना!
प्राकृतिक उपचार- उपर दिये गये लक्षणों से आप समस्या का निदान करके तथा कुछ योगासन करके आप इस रोग को कुछ हद तक कम कर सकती हैं बाकी का काम आयुर्वेदिक योग कर देते हैं।
आप पेशाब करते समय कुछ समय के लिये पेशाब को रोके रहें तथा फ़िर चालू करें, ऐसा जब भी पेशाब करने जाएँ तभी 3-4 बार करें, इससे योनि की पेशियाँ सुदृढ़ होती हैं।
वज्रासन की स्थिति में बैठकर शंखचालिनी मुद्रा और मूल बंध लगाने का अभ्यास नियमित करने से भी योनि संकोच होता है।
आयुर्वेदिक उपचार-
1- हरा माजूफल, फिटकरी के आग पर किये हुए फूले व गुलाब के फूल बराबर मात्रा में लेकर बारीक से बारीक पीस लें। इसे योनि में रखकर एक
बारीक सा कपड़ा ढीला ढाला सा बाँध लें।
यह प्रक्रिया लगातार फायदा न होने तक करें।
2-ढाक के गोंद की बत्ती बनाकर योनि में रखें।
3-आँवले पेड़ की छाल 24 घण्टा पानी में भिगोकर इस पानी से ही योनि को धोऐं कुछ दिनों इस प्रयोग को लगातार बिना नागा किये करने से योनि निश्चित ही स्वभाविक अवस्था में आ जाएगी।
यह कार्य आप रोजाना नहाते समय कर सकती हैं।
4- तीन हिस्सा फिटकरी व एक हिस्सा माजूफल का गूदा एक भाग पीसकर किसी मखमल के कपड़े की पोटली बनाकर रात को सोते समय योनि में रखने से योनि सिकुड़ जाती है।
आशा है आपको यह पोस्ट जरूर पसंद आई होगी।
आपकी सेक्स समस्याएँ, आपके विचार सादर आमंत्रित है।
तो आप मुझसे संपर्क करना न भूलें।
ram naresh Web Developer

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चुत चुदाई सेक्सी मामी की: मेरी फैन्टेसी


सभी सेक्सी चुत की मालकिनों की प्यासी चुतों को मेरे खड़े और बड़े लंड का घुस कर सलाम!
मैं प्यारा सा लड़का जीव हूँ। मैं अभी 21 साल का हूँ, पुणे महाराष्ट्र का रहने वाला हूँ। मेरी कद-काठी औसत है, मेरा लंड भी किसी भी चुत को संतुष्ट करने लायक है।
इस कहानी में मैंने अपनी मामी की चुत में उंगली डाल कर बहुत रस निकाला और पूरी रात उनको जमकर चोदा।
ये कहानी मेरी फैन्टेसी है.. जो मैंने अपनी मामी को अपने लंड पर खड़े हुए बैठा कर लिखी है।
मेरी मामी एक हाउस-वाईफ हैं, वो दिखने में भरी-पूरी माल हैं, उनकी गांड पूरी 37 इंच की उठी हुई है। जो मेरे लंड को बार-बार खड़ा करवाती रहती है। मेरे मामाजी एक बिजनेसमैन हैं। मामा-मामी को एक बेटा और एक बेटी है, वो दोनों ही स्कूल जाते हैं।
मेरा घर मामा के घर से करीबन 3 किलोमीटर दूर है और मैं लगभग हर दिन कॉलेज जाते वक्त उनके घर रुक जाता हूँ।
मैं अपने स्कूल टाइम से ही सेक्स के वीडियो देखता आ रहा हूँ।
मैं कॉलेज की छुट्टियों में मामा के घर रुका हुआ था। पर उस दिनों में मेरे मामा के बच्चों के स्कूल चल रहे थे। ऐसे में मैं और मेरी सेक्सी मामी ही घर पर अकेले रहते थे।
अब मैं तो रहा ठरकी.. मुझे तो मामी की गांड के अलावा दूसरा कुछ सूझता भी नहीं था।
मैं मामी को नहाते वक्त देख कर उनके बाद बाथरूम में जाकर उनकी 95 नम्बर वाली पेंटी पर मुठ मार लेता था।
एक दिन बहुत सारी कहानियाँ पढ़ने से मेरी उत्तेजना काफी बढ़ गई और मैंने मामी को नहाते समय ही नीचे फर्श पर अपना माल गिरा दिया। फिर डर के मारे उस पर थोड़ा पानी डाल कर टीवी देखने बैठ गया।
मैंने देखा कि मामी अपने पेटीकोट से अपनी चूचियों को ढकते हुए लंगड़ाती हुई जा रही थीं।
मैंने लंगड़ा कर चलने का कारण पूछा तो उन्होंने मेरी तरफ देखा और बताया- मेरे घुटने में चोट लग गई है, बहुत दर्द हो रहा है, इधर कुछ चिकना सा पड़ा था जिससे मैं फिसल गई।
मैं उनको मस्त और वासना भरी नजरों से देख रहा था। उनकी फिसलने की बात सुन कर मुझे अपनी मुठ का ख्याल आया और मैं मन ही मन मुस्कुरा दिया।

नंगी चुत मामी की

तभी जाते वक्त उनका पेटीकोट दरवाजे के कीले में अटक गया लेकिन उन्हें कुछ पता नहीं था और वो आगे बढ़ीं.. तो पूरा पेटीकोट पीछे कीले में फंस कर रह गया। वो उसे पकड़ने के लिए मेरी तरफ को मुड़ीं.. तो यारों क्या कहर ढा रही थीं.. इस वक्त पेटीकोट के फट जाने से वो पूरी नंगी हो गई थीं।
उनकी चुत बहुत सारे काले बालों से छुपी हुई थी और उनके बोबे तो मस्त उछल रहे थे। मैं उन्हें ही घूरे जा रहा था।
मामी अब तब तक अपना पेटीकोट कीले से निकाल कर अपने बेडरूम में चली गईं।
इसके तुरन्त बाद मैं भी स्नान करने घुस गया और दोबारा से उनके पेंटी में मुठ मार कर शांत हो गया।
मामी के बच्चे स्कूल में थे और मामाजी ऑफिस गए हुए थे। घर पर मैं और मामी ही थीं।
मैं टीवी देख रहा था, तभी मुझे मामाजी का कॉल आया कि मामी को लेकर अस्पताल आ जा। क्योंकि मेरे मामी के घुटनों में बहुत दर्द था। उसी के लिए मामा जी ने मुझे उनको लेकर आने के लिए कहा था।हम दोनों करीब 11 बजे निकल पड़े। हमने रास्ते में कुछ भी बात नहीं की। मामी ने अपनी जांच कराई और मेडिकल से दवा आदि के साथ-साथ बाम भी ले ली।
हम वहाँ से बाईक पर निकले। आते वक्त ट्रेफिक हो गया था.. तो मुझे रूक-रूक कर आना पड़ा। उस दौरान कई बार मजबूरी में तेज स्पीड को रोकने के लिए ब्रेक दबाने पड़े तो उनके बोबों को अपने पीठ पर दबने से मजा लिया।
हम घर पहुँचे तो घर पर हम दोनों ही थे। कामवाली आकर चली गई थी और बच्चों को स्कूल से आने में अभी दो घंटे थे। मैं टीवी देखने बैठ गया और मामी अपने रूम में चली गई थीं।
मामी ने मुझे आवाज लगा कर मुझे बाम लगाने में मदद करने में कहा।
मैं उनके बेडरूम में आकर उनके पैरों के नजदीक बैठ गया और बाम लगाने लगा। मैं पूरे मजे से बाम लगाता रहा और मामी कब सो गईं.. मुझे पता ही नहीं चला।
जब मुझे पता लगा कि मामी सो रही हैं तो मैं हिम्मत करके उनकी साड़ी और पेटीकोट को उनके कमर तक ले गया। मुझे डर तो बहुत लग रहा था.. पर मुझ पर वासना हावी हो चुकी थी।

मामी की चुत में उंगली

अब मेरे सामने लाल कलर की पेंटी में मेरी प्यारी मामी की चुत कैद थी। मैंने धीरे से उनकी पेंटी साईड से खोली और अपनी उंगली अन्दर घुसाने लगा।
मामी के चुत पर बहुत सारे बाल थे, तो मुझे उनके छेद का अनुमान नहीं लग रहा था।
तभी मामी सोते सोते अपने हाथ से चुत खुजाने लगीं। मैंने डर के मारे उनकी साड़ी छोड़ दी। लेकिन मुझ पर वासना अभी बाकी थी, तो मैं कुछ पल बाद फिर से उनकी चुत में उंगली डालने लगा।
इस बार मेरी उंगली सीधी उनकी चूत के छेद पर जा लगी और मैंने देर न करते हुए उसे चुत के अन्दर डाल दिया। मुझे चुत बड़ी गर्म लगी.. पर मैंने उंगली को चुत में आगे-पीछे करना शुरू कर दिया।
कुछ मिनट तक यूँ ही मैं उनकी चुत में उंगली करता रहा। मैं पूरे मूड में चल रहा था।
तभी मामी अपने हाथ से चुत के पास झांटों को खुजाने लगीं। झांटें खुजाते हुए मामी के हाथ को मेरे हाथ का स्पर्श हुआ लेकिन मामी कुछ नहीं बोलीं।
इससे मेरी हिम्मत बढ़ गई। मैंने बाजू में लेट कर धीरे से उनकी पेंटी को नीचे किया और बड़े प्यार से दो-दो उंगली से चुत को सूँघते हुए अन्दर-बाहर डालता रहा। उनकी चुत लिसलिसी होने लगी थी।
अब तो मामी ने भी टांगें फैला दीं और सिसकारियां भरने लगीं, उनकी चुत अब भरपूर रस छोड़ने लगी।
तभी अचानक जोर से दरवाजे की बेल बजी और मामी जी ने झट से घुटनों तक उठ बैठीं।
वाह.. क्या नजारा था यारों.. मामी के पैर फैले हुए.. पेंटी नीचे की तरफ थी।
मेरी दो उंगलियां अब भी चुत में घुसी हुई चूत का मर्दन कर रही थीं।
फिर हमने झट से अलग होकर खुद को ठीक-ठाक किया और अपने दूसरे काम में लग गए।
मैंने दरवाजा खोला तो उनकी बेटी स्कूल से आ गई थी।
फिर उस दिन हमारा दिन यूं ही कट गया।
मुझे तो मामी को चोदना ही था.. तो मैं मौका ढूँढ रहा था। मामा आज रात देर बारह बजे तक आने वाले थे। ऐसा मुझे उनके बच्चों की बातों से सुनने को मिला। यह जानते ही मेरे लंड के घोड़े दौड़ पड़े कि मामी की चुत को कैसे चोदें।रात गहराने लगी.. दस बजे तक सो गए पर मामी अपना काम कर रही थीं।
मैंने उनको पीछे से जाकर पकड़ा और सीधे उनके बोबे दबाने लगा। मैंने मामी को कोई मौका न देते हुए सीधा दूसरे हाथ से उनकी चुत को पूरी ताकत से साड़ी के ऊपर से ही मसलने लगा।
इस अचानक हुए हमले से वो संभल नहीं पाईं और वो भी अब सिसकारियां भरने लगीं। मैंने उनको सीधा किया और झट से उनको चुम्मी करने लगा। चुम्मी के साथ ही मेरे दोनों हाथ उनके एक बोबे और चुत को मसल रहे थे।
इस ताबड़तोड़ घिसाई से उनका रस एकदम से ही निकल गया और उनकी पेंटी पूरी गीली हो गई।
अब मैं उनको अपने कमरे में ले गया और उनको बिस्तर पर लिटा कर उनके ऊपर चढ़ कर उनको किस करने लगा।
कुछ ही पलों में मैंने उनका ब्लाउज निकाल फेंका और उनका दूध पीने लगा। वो भी मेरे लंड को पेंट के ऊपर से ही मसलने लगीं।
मैंने दूध पीते-पीते एक हाथ उनकी साड़ी में डाल कर उनकी गीली हो चुकी पेंटी को निकाल कर सूँघने लगा। मैंने तेजी से उनके नीचे जाकर पेटीकोट ऊपर करके सीधे अपने मुँह से बड़ी तेजी से चुत को चूसने लगा, दो ही मिनट में वे फिर से झड़ गईं।
मैं मामी को पूरी नंगी नहीं करना चाहता था.. क्योंकि मुझे उनको वैसे ही चोदना था और मेरे पास वक्त भी कम था।
मैं उनके सिरहाने आकर उनसे अपने लंड को चूसने को कहा.. तो मामी ने मना कर दिया। फिर भी मैंने जबरदस्ती से मामी के मुँह में लंड डाल दिया और उनका मुँह चोद डाला।
कुछ देर लंड चुसाई के बाद अपना सारा वीर्य उनके मुँह में छोड़ दिया जब टक उन्होंने मेरा रस पी नहीं लिया मैंने लंड को उनके मुँह से हटाया ही नहीं और जबरदस्ती उनको लंड का रस पिला दिया।

मामी की चुत चुदाई

अब असली चुदाई की बारी थी.. तो मैंने नीचे जाकर मामी की चुत को फैला कर अपना लंड सीधा उनकी चुत पर टिका दिया। सुपारा फांकों में फंसा कर एक जोर से धक्का मार कर पूरा लंड अन्दर पेल दिया।
मामी तो मजे में जोर से चिल्ला पड़ीं और मुझे सीने से लगाकर किस करने लगीं, मैंने जोरदार झटके चालू कर दिए।
मामी अभी अपनी गांड उठा-उठा कर मेरा साथ देने लगीं। वो लगातार ‘आहें..’ भर रही थीं ‘आहहह.. ऊमम.. आहह.. जोरर.. से करर.. आहहहह.. उम्म्ह… अहह… हय… याह… उम्महह.. आह.. मजा आ गया है..’
उनकी कामुक आवाजें रूम में गूंजने लगी थीं।
फिर मैंने मामी को अपने ऊपर ले लिया और वो मेरे लंड पर उछल-कूद करने लगीं। अब वो मुझे चोदे जा रही थीं। वो बहुत भारी थीं.. तब भी मुझे उनको चोदने मजा आ रहा था।
अभी एक बजने के करीब का समय हो रहा था। मैंने जल्दी से उन्हें डॉगी स्टाईल में करके पीछे से उनकी चुत में लंड घुसा कर पूरी स्पीड से चोदना शुरू कर दिया। मामी ने बिस्तर पर घोड़ी बने हुए तकिया पूरी ताकत से पकड़ा हुआ था। मामी इस दौरान चार बार झड़ चुकी थीं।
अब मेरा भी निकलने वाला था.. तो मैंने उन्हें सीधा करके उनके मस्त बोबों पर मेरा पूरा माल छोड़ दिया और हम एक-दूसरे से लिपटे पड़े रहे। मैं एक हाथ उनकी चुत में घुसा कर लेटा हुआ था।
करीबन आधा घंटे बाद मामाजी आ गए.. दरवाजे पर घंटी बजी, मामी खुद को ठीक करके अपने कमरे में चली गई, मैंने दरवाजा खोल दिया।
ram naresh Web Developer

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